जब-जब बंटे, तब-तब कमजोर हुए : मोहन भागवत
नागपुर में आरएसएस के विजयादशमी समारोह में स्वदेशी, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक एकता पर दिया जोर

नागपुर, 20 अक्टूबर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के समापन अवसर पर मंगलवार को महाराष्ट्र के नागपुर स्थित रेशिमबाग मैदान में विजयादशमी समारोह आयोजित किया गया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने शस्त्र पूजा कर संगठन के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार को श्रद्धांजलि अर्पित की। अपने संबोधन में उन्होंने सामाजिक एकता, स्वदेशी और भारतीय संस्कृति से जुड़ाव के महत्व पर जोर दिया।
समारोह में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सहित कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं।
स्वदेशी और सांस्कृतिक पहचान पर जोर
मोहन भागवत ने कहा कि संघ पिछले 100 वर्षों से भारत की सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और मूल्यों के आधार पर समाज को संगठित करने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने और अपनी संस्कृति को समझने की आवश्यकता बताई। उन्होंने बंगाल के राजनारायण बसु की पहल का उल्लेख करते हुए स्वदेशी मेलों के जरिए सांस्कृतिक जागरूकता फैलाने के प्रयासों को याद किया।
संत रविदास के संदेश का उल्लेख
भागवत ने संत रविदास के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी लोगों को धर्म पर टिके रहने, भेदभाव मिटाने और भक्ति का मार्ग अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने सामाजिक एकता और आपसी मेलजोल को मजबूत करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
संघ की स्थापना वर्ष 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में हुई थी। हर वर्ष आयोजित होने वाला यह समारोह संगठन की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इस बार का आयोजन संघ के 100 वर्षों के सफर और उसकी गतिविधियों के संदर्भ में विशेष महत्व रखता है।













