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नौकरी से बर्खास्तगी सरकारी कर्मचारी के लिए मृत्युदंड से कम नहीं : सुप्रीम कोर्ट

आय से अधिक संपत्ति के आरोप में हटाए गए पेरियार विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवनन की सेवा बहाल रखने का फैसला बरकरार, जांच में ठोस सबूत नहीं मिलने पर अदालत की सख्त टिप्पणी

नई दिल्ली, 20 अक्टूबर। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त किए जाने को सजा का सबसे कठोर रूप बताते हुए कहा है कि इसके परिणाम कर्मचारी और उसके परिवार पर दूरगामी असर डालते हैं। अदालत ने टिप्पणी की कि सरकारी सेवा से बर्खास्तगी किसी कर्मचारी के लिए मृत्युदंड से कम नहीं है। इसी के साथ शीर्ष अदालत ने पेरियार विश्वविद्यालय के डिप्टी रजिस्ट्रार आर. सरवनन की सेवा बहाल करने के मद्रास हाई कोर्ट की एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा है। सरवनन को कथित तौर पर आय से अधिक संपत्ति रखने के आरोप में बर्खास्त किया गया था।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने 16 अक्टूबर को दिए फैसले में कहा कि बर्खास्तगी से कर्मचारी के सेवा संबंधी लाभ समाप्त हो जाते हैं और उसके सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो सकता है। ऐसे गंभीर परिणामों वाले मामलों में न्यायालय मूकदर्शक नहीं बना रह सकता।

जांच रिपोर्ट में नहीं मिले पर्याप्त सबूत

सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट की खंडपीठ के आदेश को रद्द करते हुए कहा कि विश्वविद्यालय की ओर से गठित एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट में सरवनन को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त साक्ष्य नहीं थे। पीठ के अनुसार, आरोपों के समर्थन में ठोस सबूतों के बजाय अनुमान और अटकलों के आधार पर निष्कर्ष निकाले गए।

अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि जब आरोप साबित करने के लिए जरूरी साक्ष्य ही उपलब्ध नहीं थे, तब कर्मचारी को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है। बर्खास्तगी के आदेश में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया था कि विश्वविद्यालय के सिंडिकेट ने आयोग की रिपोर्ट को स्वीकार करने के लिए क्या ठोस कारण दिए थे।

हाई कोर्ट की न्यायिक समीक्षा की शक्ति पर जोर

शीर्ष अदालत ने कहा कि हाई कोर्ट संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल कर ऐसे मामलों में हस्तक्षेप कर सकता है, जहां किसी प्रशासनिक या अनुशासनात्मक आदेश में अवैधता, अतार्किकता या प्रक्रिया संबंधी गंभीर खामी हो। केवल वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध होने के आधार पर हर मामले में न्यायिक समीक्षा से इनकार नहीं किया जा सकता।

पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि किसी जांच का निष्कर्ष साक्ष्यों के अभाव में या कानूनन अस्वीकार्य अनुमानों के आधार पर निकाला गया हो, तो रिट कोर्ट अन्याय को सुधारने के लिए हस्तक्षेप कर सकता है। अदालत ने माना कि इस मामले में हाई कोर्ट की एकल पीठ ने आयोग की रिपोर्ट और बर्खास्तगी के आधारों की जांच करके उचित कदम उठाया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले में यह रेखांकित किया गया कि सरकारी कर्मचारी के खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई करते समय ठोस साक्ष्य और निष्पक्ष प्रक्रिया आवश्यक हैं। केवल संदेह या अनुमानों के आधार पर सेवा से बर्खास्तगी जैसे गंभीर दंड को उचित नहीं ठहराया जा सकता।

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