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550 करोड़ रुपये मुआवजा वितरण के बाद भी पुनर्वास पर संशय, 30 हजार परिवारों के भविष्य का सवाल

एनसीएल की जयंत और दूधिचुआ परियोजनाओं से प्रभावित मोरवा के परिवारों के पुनर्वास की चुनौती बरकरार, खिरवा में 50 हेक्टेयर जमीन की मांग; कुसवाई और चटका में भी जमीन तलाशने की कवायद

सिंगरौली। एनसीएल की जयंत एवं दूधिचुआ परियोजनाओं से प्रभावित मोरवा क्षेत्र के परिवारों के विस्थापन और पुनर्वास का मुद्दा अब भी ठोस समाधान की प्रतीक्षा में है। एक ओर प्रभावित परिवारों को मुआवजा देने के बाद मकानों को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर उनके स्थायी पुनर्वास के लिए पर्याप्त जमीन उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती बना हुआ है। करीब 550 करोड़ रुपये के मुआवजा वितरण की जानकारी के बीच अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि प्रभावित परिवारों को व्यवस्थित तरीके से बसाने की व्यवस्था कब और कहां होगी।
सूत्रों के अनुसार, इस विस्थापन प्रक्रिया से करीब 30 हजार परिवार प्रभावित होने हैं। योजना को तीन स्ट्रिप में पूरा करने की तैयारी बताई जा रही है, जिसमें पहले चरण में लगभग 6,500 मकानों के विस्थापन का अनुमान है। इतने बड़े पैमाने पर परिवारों को स्थानांतरित करने के लिए जमीन, आवासीय सुविधाओं, सड़क, बिजली, पानी और अन्य बुनियादी जरूरतों की व्यवस्था करना जरूरी होगा। ऐसे में पुनर्वास स्थल को लेकर स्पष्ट निर्णय नहीं होने से प्रभावित परिवारों की चिंता बनी हुई है।

खिरवा में 50 हेक्टेयर जमीन की मांग
पुनर्वास की दिशा में एनसीएल प्रबंधन की ओर से जिला प्रशासन से खिरवा गांव में करीब 50 हेक्टेयर भूमि उपलब्ध कराने की मांग किए जाने की जानकारी सामने आई है। माना जा रहा है कि जमीन उपलब्ध होने पर प्रभावित परिवारों को बसाने की योजना को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है। हालांकि, भूमि आवंटन, विकास कार्यों और परिवारों को बसाने की समय-सीमा को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है।
पुनर्वास के लिए केवल जमीन की उपलब्धता ही पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि वहां आवासीय सुविधाओं और आवश्यक नागरिक सेवाओं का विकास भी करना होगा। प्रभावित परिवारों के लिए यह जानना जरूरी है कि उन्हें किस स्थान पर बसाया जाएगा और पूरी प्रक्रिया किस समयसीमा में पूरी होगी।

कुसवाई की 45 हेक्टेयर जमीन पर भी नजर
खिरवा के अलावा कुसवाई गांव में करीब 45 हेक्टेयर भूमि को लेकर भी चर्चा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, वर्ष 2016 से 2023 के बीच यह जमीन पौधरोपण के उद्देश्य से वन विभाग को दी गई थी। अब इस भूमि की वास्तविक स्थिति और पुनर्वास के लिए उसकी संभावित उपयोगिता की जांच कराने की मांग उठ रही है।
बताया जा रहा है कि इस जमीन पर पौधरोपण नहीं होने का दावा किया जा रहा है। ऐसे में भूमि के वर्तमान उपयोग, वन विभाग से संबंधित स्थिति और लागू नियमों की जांच के बाद ही यह तय हो सकेगा कि इसका इस्तेमाल पुनर्वास के लिए किया जा सकता है या नहीं। यदि जमीन उपलब्ध कराने की कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी होती है, तो यह पुनर्वास योजना के लिए एक विकल्प बन सकती है।

चटका में 33 एकड़ जमीन पर बसाने की संभावना
मोरवा न्यू बस स्टैंड के समीप चटका क्षेत्र में एनसीएल की करीब 33 एकड़ जमीन पर भी विस्थापित परिवारों को बसाने की संभावनाएं तलाशे जाने की जानकारी सूत्रों ने दी है। हालांकि, इस जमीन पर पुनर्वास को लेकर अंतिम निर्णय की स्थिति स्पष्ट नहीं है। खिरवा, कुसवाई और चटका में उपलब्ध जमीनों की स्थिति का आकलन कर समन्वित योजना तैयार करना प्रभावित परिवारों के पुनर्वास के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है।
इन संभावित स्थलों पर निर्णय लेते समय जमीन की उपलब्धता के साथ-साथ वहां तक पहुंच, पेयजल, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका जैसी सुविधाओं को भी ध्यान में रखना होगा। स्थायी पुनर्वास तभी प्रभावी होगा, जब परिवारों को केवल रहने के लिए जगह ही नहीं, बल्कि सामान्य जीवन चलाने के लिए जरूरी सुविधाएं भी मिलें।

एनसीएल के प्रयास, अब जिला प्रशासन के निर्णय पर निगाहें
पुनर्वास के लिए जमीन उपलब्ध कराने और प्रशासनिक स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया अब अहम पड़ाव पर दिखाई दे रही है। एनसीएल प्रबंधन की ओर से जमीन के विकल्प तलाशे जाने की जानकारी है, लेकिन प्रभावित परिवारों को स्थायी रूप से बसाने के लिए जिला प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी। ऐसे में अब नए कलेक्टर और संबंधित विभागों के निर्णय पर निगाहें टिकी हैं।
प्रभावित परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि मुआवजा मिलने के बाद उन्हें स्थायी रूप से कहां बसाया जाएगा और पुनर्वास की प्रक्रिया कब पूरी होगी। करीब 30 हजार परिवारों से जुड़े इस मुद्दे पर जमीन की उपलब्धता, प्रशासनिक स्वीकृति और पुनर्वास स्थलों के विकास को लेकर स्पष्ट कार्ययोजना सामने आना जरूरी है। जब तक ठोस समयसीमा और सुविधाओं सहित पुनर्वास की व्यवस्था स्पष्ट नहीं होती, तब तक प्रभावित परिवारों की चिंता दूर होना मुश्किल है।

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