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ऑपरेशन टाइगर से महाराष्ट्र की राजनीति में बढ़ी हलचल, शिंदे गुट की ताकत हुई मजबूत

 

 

मुंबई। महाराष्ट्र की राजनीति में इन दिनों चर्चित “ऑपरेशन टाइगर” ने नया राजनीतिक समीकरण खड़ा कर दिया है। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) के छह सांसदों के शिंदे गुट के समर्थन में आने के बाद मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की राजनीतिक स्थिति और मजबूत हो गई है। इस घटनाक्रम से लोकसभा में शिंदे गुट के सांसदों की संख्या बढ़कर 13 हो गई है।

 

मुख्यमंत्री शिंदे ने कहा कि नए शामिल हुए सांसदों के निर्वाचन क्षेत्रों के विकास कार्यों को प्राथमिकता दी जाएगी। उन्होंने जल्द ही सभी मंत्रियों की बैठक बुलाकर सांसदों के क्षेत्रों से जुड़ी लंबित परियोजनाओं की समीक्षा करने और उनके समाधान के निर्देश देने की घोषणा की। इस दौरान उन्होंने ओमराजे निंबालकर का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उनके पिता पवनराजे निंबालकर हत्याकांड में न्याय दिलाने के लिए सरकार हर संभव सहयोग करेगी। उल्लेखनीय है कि हाल ही में एक विशेष अदालत ने इस मामले में पूर्व गृह मंत्री पद्मसिंह पाटिल समेत आठ आरोपियों को बरी कर दिया था, जबकि केंद्रीय जांच ब्यूरो इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती देने की तैयारी कर रहा है।

 

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार छह सांसदों का यह कदम महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है। लोकसभा में शिंदे गुट की संख्या बढ़ने से राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी राजनीतिक स्थिति मजबूत हुई है। अब महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटों में कांग्रेस और शिंदे नेतृत्व वाली शिवसेना के 13-13 सांसद हैं। भाजपा के नौ, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के एक तथा राष्ट्रवादी कांग्रेस (शरद पवार) के आठ सांसद हैं। वहीं शिवसेना यूबीटी की ताकत घटकर केवल तीन सांसदों तक सीमित रह गई है।

 

यह घटनाक्रम उद्धव ठाकरे के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे बड़ी संख्या में विधायकों को अपने साथ लेकर अलग हो चुके थे। उस राजनीतिक बगावत के बाद पार्टी का संगठनात्मक और विधायी ढांचा प्रभावित हुआ था। अब लोकसभा में भी बड़ी टूट के बाद ठाकरे खेमे के सामने नई राजनीतिक चुनौतियां खड़ी हो गई हैं।

 

फिलहाल “ऑपरेशन टाइगर” महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे चर्चित विषय बना हुआ है। राजनीतिक गलियारों की नजर अब लोकसभा अध्यक्ष के समक्ष लंबित प्रक्रिया और दोनों खेमों की आगामी रणनीतियों पर टिकी हुई है। शिंदे गुट इसे अपनी बड़ी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर रहा है, जबकि ठाकरे खेमे के सामने संगठन को मजबूत बनाए रखने की चुनौती है।

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