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इंदौर में दूषित पानी से मौतों का सिलसिला: प्रशासन की विफलता और संवेदनहीनता पर उठे सवाल

इंदौर – देश के सबसे स्वच्छ शहर का तमगा हासिल करने वाला इंदौर अब दूषित पानी के कारण हो रही मौतों के कारण सवालों के घेरे में है। भागीरथपुरा क्षेत्र में अब तक 14 लोगों की जान जा चुकी है, जबकि 1400 से अधिक लोग संक्रमित हो चुके हैं और 162 लोग अस्पतालों में भर्ती हैं। इस आंकड़े ने प्रशासन की नाकामी और उस विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसे अक्सर एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है।

त्रासदी और प्रशासनिक विफलता

हालांकि सरकार ने केवल चार या पांच मौतों की पुष्टि की है, लेकिन मृतकों की संख्या 14 तक पहुंच चुकी है, जिसमें से एक मृतक अरविंद था, जो अपने परिवार का एकमात्र सहारा था। इलाज के अभाव और स्वास्थ्य व्यवस्था की लचर हालत के कारण उसकी मौत हो गई। यह केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं है, बल्कि पूरे भागीरथपुरा क्षेत्र के सैकड़ों परिवारों में भय और असुरक्षा का माहौल बना हुआ है।

स्वास्थ्य विभाग द्वारा 2456 संदिग्ध मरीजों की पहचान इस बात का संकेत है कि समस्या कितनी गंभीर और व्यापक है। इसके बावजूद, प्रशासन द्वारा अब तक कोई ठोस और त्वरित समाधान सामने नहीं आया है। यह स्थिति प्रशासनिक असंवेदनशीलता और निष्क्रियता की ओर इशारा करती है, और यह सवाल खड़ा करती है कि क्या इंदौर के “स्वच्छता” के तमगे के पीछे वास्तव में लोगों की सेहत और सुरक्षा का ध्यान रखा गया है?

मंत्री का संवेदनहीन रिएक्शन

घटनास्थल पर पहुंचे मंत्री कैलाश विजयवर्गीय का रिएक्शन और मृतकों के परिजनों को मुआवज़े के चेक देना संवेदनशीलता की बजाय औपचारिकता की तरह महसूस हुआ। जब पीड़ित परिवारों ने मुआवज़े के चेक लेने से इनकार किया, तो यह संकेत था कि उन्हें आर्थिक सहायता से कहीं ज्यादा जरूरी था – जवाबदेही और न्याय।

मंत्री का यह कहना कि इलाज के खर्च की भरपाई को लेकर सवाल करने वाले मीडिया के सामने असंवेदनशील और गैर-जिम्मेदाराना था। इस पर बाद में माफ़ी मांगना, कोई सार्थक समाधान नहीं दे सकता। इससे यह साफ दिखता है कि संकट के वक्त सरकार और जनप्रतिनिधियों से जिस संवेदनशीलता की उम्मीद होती है, वह बिल्कुल नदारद थी।

मुख्यमंत्री का आश्वासन, पर कार्रवाई का सवाल

मुख्यमंत्री ने मामले में “दोषियों पर सख्त कार्रवाई” का आश्वासन दिया, जो कि एक सामान्य बयान की तरह प्रतीत हुआ। सवाल यह है कि क्या यह बयान भी अन्य आश्वासनों की तरह फाइलों में बंद हो जाएगा, या फिर वाकई जिम्मेदार अधिकारियों और नेताओं पर कार्रवाई की जाएगी?

यह घटना सिर्फ दूषित पानी से हुई मौतों का मामला नहीं है, बल्कि यह उस व्यवस्था की गंदगी को भी उजागर करती है, जो बार-बार आम नागरिकों की जान लेती है। हर बार जांच और आश्वासन के नाम पर मामले को ढक दिया जाता है, लेकिन जवाबदेही की कोई ठोस पहल कभी नहीं होती।

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