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दुष्कर्म मामले में बरी हुआ युवक, लेकिन ‘मीडिया ट्रायल’ का दाग कौन मिटाएगा?

सिंगरौली। जिले के कोतवाली थाना क्षेत्र अंतर्गत खुटार निवासी राकेश शाह, पिता राम लखन शाह को दुष्कर्म के एक चर्चित मामले में लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय से दोषमुक्त कर दिया गया है। हालांकि, इस फैसले के बाद एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—क्या ‘मीडिया ट्रायल’ से हुई सामाजिक क्षति की भरपाई संभव है?

मामला उस समय सुर्खियों में आया था, जब युवक पर शादी का झांसा देकर दुष्कर्म का आरोप लगा था। आरोप लगते ही विभिन्न मंचों पर खबरें प्रमुखता से प्रकाशित हुईं और युवक की छवि पर गहरा असर पड़ा। लेकिन वर्षों तक चली सुनवाई के बाद न्यायालय ने साक्ष्यों के अभाव में उसे बरी कर दिया।

कानून का सिद्धांत स्पष्ट है कि जब तक किसी व्यक्ति को न्यायालय दोषी सिद्ध न करे, तब तक वह निर्दोष माना जाता है। बावजूद इसके, समाज में अक्सर एफआईआर दर्ज होते ही व्यक्ति को अपराधी मान लिया जाता है। इस मामले में भी यही स्थिति देखने को मिली।सूत्रों के अनुसार, दोनों पक्षों के बीच लंबे समय तक संबंध रहे थे, जिसके बाद विवाद उत्पन्न हुआ और मामला न्यायालय तक पहुंचा। वहीं, जांच के दौरान युवक के पासपोर्ट को निरस्त कराने की प्रक्रिया भी शुरू की गई थी, जिससे उसके पेशेवर जीवन पर भी असर पड़ा।

अब जबकि अदालत ने उसे दोषमुक्त कर दिया है, यह सवाल उठना लाजिमी है कि उस दौरान हुई सामाजिक और मानसिक क्षति की जिम्मेदारी कौन लेगा।यह मामला ‘मीडिया ट्रायल’ और सामाजिक धारणा पर गंभीर बहस को जन्म देता है—क्या आरोप लगते ही किसी को अपराधी मान लेना न्यायसंगत है? और क्या दोषमुक्ति के फैसलों को भी उतनी ही प्रमुखता मिलनी चाहिए, जितनी आरोपों को मिलती है?

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