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सुप्रीम कोर्ट सख्त: शांतिपूर्ण छात्र आंदोलन पर बल प्रयोग बर्दाश्त नहीं, दोषी पुलिसकर्मियों पर होगी कार्रवाई

 

नई दिल्ली। प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को स्पष्ट कहा कि लोकतंत्र में शांतिपूर्ण आंदोलन नागरिकों का संवैधानिक अधिकार है और ऐसे आंदोलनों पर अनावश्यक बल प्रयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि किसी पुलिसकर्मी ने जरूरत से अधिक बल का इस्तेमाल किया है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई की जाएगी।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ, जिसमें जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल हैं, मामले की सुनवाई कर रही है। अदालत ने कहा कि याचिकाओं में पेलेट गन, इलेक्ट्रिक बैटन, लाठीचार्ज, आंसू गैस के इस्तेमाल तथा महिलाओं और पत्रकारों के साथ कथित मारपीट जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जिनकी स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कराई जाएगी।

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन ने अदालत को बताया कि यह मामला केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश, बिहार, नागपुर सहित कई राज्यों में छात्रों के प्रदर्शनों और पुलिस कार्रवाई से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया कि जंतर-मंतर पर पुलिस ने निर्धारित प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया और सादे कपड़ों में मौजूद पुलिसकर्मियों ने भी प्रदर्शनकारियों के साथ हिंसा की।

सुनवाई के दौरान राज्यसभा सांसद मनोज झा की ओर से दायर याचिका का भी उल्लेख किया गया, जिसमें बिहार के सीवान में प्रदर्शन के दौरान एक पुलिसकर्मी द्वारा प्रदर्शनकारी पर एके-47 तानने का आरोप लगाया गया है। वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता शादन फरासत ने दावा किया कि दिल्ली में प्रदर्शन समाप्त होने के बाद भी कनॉट प्लेस में प्रदर्शनकारियों और वहां मौजूद वकीलों के साथ मारपीट की गई, जो अत्यधिक बल प्रयोग का मामला है। अदालत ने कहा कि जवाबदेही तय किए बिना जांच का कोई औचित्य नहीं होगा।

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