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भारत ने स्वदेशी महासागर अनुसंधान पोत ‘सागर मंथन’ किया लॉन्च, गहरे समुद्र की खोज को मिलेगा नया आधार

कोलकाता। भारत ने महासागरीय विज्ञान और गहरे समुद्र के वैज्ञानिक अध्ययन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाते हुए स्वदेशी महासागर अनुसंधान पोत ‘ओआरवी सागर मंथन’ लॉन्च किया है। कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई) ने बुधवार को इस पोत का जलावतरण किया। यह अनुसंधान पोत राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र (एनसीपीओआर) के लिए तैयार किया जा रहा है।

करीब 840 करोड़ रुपये की लागत वाली इस परियोजना को भारत की समुद्री वैज्ञानिक और तकनीकी क्षमताओं को मजबूत करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पोत के निर्माण का उद्देश्य समुद्र की गहराइयों में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए देश को एक आधुनिक और समर्पित मंच उपलब्ध कराना है।

गहरे समुद्र की खोज के लिए मजबूत होगा वैज्ञानिक आधार

महासागर पृथ्वी की जलवायु, समुद्री पारिस्थितिकी, प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। समुद्र की गहराइयों में अनेक ऐसी प्राकृतिक प्रक्रियाएं और जैविक परिस्थितियां मौजूद हैं, जिनका विस्तृत अध्ययन अभी भी वैज्ञानिकों के लिए चुनौती बना हुआ है।

‘सागर मंथन’ के परिचालन में आने के बाद भारतीय वैज्ञानिकों को समुद्री क्षेत्रों में लंबी अवधि के अनुसंधान, आंकड़े जुटाने और विभिन्न महासागरीय प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए बेहतर आधार मिलने की उम्मीद है।

एनसीपीओआर के लिए तैयार हो रहा पोत

‘सागर मंथन’ का निर्माण राष्ट्रीय ध्रुवीय एवं महासागर अनुसंधान केंद्र के लिए किया जा रहा है। एनसीपीओआर देश में ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान से जुड़े कार्यक्रमों का प्रमुख संस्थान है। ऐसे में इस तरह के स्वदेशी अनुसंधान पोत से समुद्री विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में अध्ययन क्षमता बढ़ने की संभावना है।

यह परियोजना वैज्ञानिक संस्थानों और भारतीय जहाज निर्माण उद्योग के बीच बढ़ते सहयोग को भी दर्शाती है। विशेष वैज्ञानिक जरूरतों के अनुरूप देश में ही अनुसंधान पोत तैयार किया जाना आत्मनिर्भर समुद्री तकनीक की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

840 करोड़ की परियोजना, 2028 तक उपयोग में आने की उम्मीद

अधिकारियों के अनुसार ‘सागर मंथन’ परियोजना की अनुमानित लागत करीब 840 करोड़ रुपये है। बुधवार को इसके लॉन्च के बाद अब पोत को अंतिम रूप देने, तकनीकी परीक्षण और परिचालन संबंधी तैयारियों का चरण आगे बढ़ेगा।

बताया गया है कि पोत के 2028 की शुरुआत तक उपयोग के लिए तैयार होने की उम्मीद है। इसके बाद इसे नियमित महासागरीय अनुसंधान अभियानों में शामिल किया जा सकेगा।

समुद्री विज्ञान और जलवायु अध्ययन में मदद

महासागर पृथ्वी की जलवायु प्रणाली का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। समुद्र के तापमान, धाराओं, रासायनिक संरचना और समुद्री जीव-जगत में होने वाले बदलावों का अध्ययन जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरणीय बदलावों को समझने में मदद करता है।

‘सागर मंथन’ जैसे अनुसंधान पोत वैज्ञानिकों को समुद्र के विभिन्न हिस्सों तक पहुंच बनाकर प्रत्यक्ष अध्ययन और वैज्ञानिक आंकड़े एकत्र करने में सक्षम बनाते हैं। इससे देश की महासागरीय अनुसंधान अवसंरचना को और मजबूत करने की उम्मीद है।

स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता का प्रदर्शन

इस परियोजना का एक महत्वपूर्ण पहलू इसका भारत में निर्मित होना है। कोलकाता स्थित जीआरएसई लंबे समय से जहाज निर्माण क्षेत्र में काम कर रहा है। महासागर अनुसंधान जैसे अत्याधुनिक और विशेष क्षेत्र के लिए पोत तैयार करना भारतीय जहाज निर्माण उद्योग की बढ़ती तकनीकी क्षमता को भी दर्शाता है।

इस तरह ‘सागर मंथन’ परियोजना एक साथ दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों को मजबूती देती है—पहला, देश की स्वदेशी जहाज निर्माण क्षमता और दूसरा, महासागरीय वैज्ञानिक अनुसंधान।

ध्रुवीय और महासागरीय अनुसंधान को मिलेगा नया मंच

एनसीपीओआर से संबद्धता के कारण इस पोत की भूमिका भारत के व्यापक महासागरीय और ध्रुवीय अनुसंधान कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण हो सकती है। समुद्र और ध्रुवीय क्षेत्र वैश्विक जलवायु व्यवस्था से गहराई से जुड़े हैं। इनके अध्ययन से पर्यावरणीय बदलावों को समझने और वैज्ञानिक नीति निर्माण में सहायता मिलती है।

कोलकाता से शुरू हुआ नया चरण

बुधवार को कोलकाता में आयोजित कार्यक्रम के दौरान यार्ड 3041 को आधिकारिक रूप से ‘ओआरवी सागर मंथन’ नाम दिया गया। लॉन्च के साथ परियोजना ने निर्माण से आगे बढ़कर परीक्षण और परिचालन की दिशा में कदम रखा है।

भारत में महासागर अनुसंधान की जरूरत लगातार बढ़ रही है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री जैव विविधता, प्राकृतिक संसाधन, समुद्री प्रदूषण और गहरे समुद्र में होने वाली प्राकृतिक प्रक्रियाओं से जुड़े सवालों के जवाब के लिए आधुनिक अनुसंधान सुविधाएं जरूरी हैं।

‘सागर मंथन’ के परिचालन में आने के बाद भारत की समुद्री वैज्ञानिक क्षमता को नई मजबूती मिलने की उम्मीद है। 840 करोड़ रुपये की यह परियोजना स्वदेशी तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और महासागर के गहन अध्ययन की दिशा में देश के दीर्घकालिक प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है।

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