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आजादी की लड़ाई में अंग्रेजों से टकराए थे लाल कुमार सिंह चंदेल, 32 महीने जेल में बिताए; इंदिरा गांधी ने ताम्रपत्र देकर किया था सम्मानित

सिंगरौली। देश की आजादी के लिए चले संघर्ष में तत्कालीन सीधी जिले के चितरंगी अंचल की भी महत्वपूर्ण भागीदारी रही है। इसी क्षेत्र की दुधमनिया गांव की धरती से जुड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी स्वर्गीय लाल कुमार सिंह चंदेल ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। गिरफ्तारी, जेल और यातनाओं के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा। स्वतंत्रता आंदोलन में उनके योगदान के लिए वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें ताम्रपत्र देकर सम्मानित किया था। उन्हें अविभाजित सीधी जिले का प्रथम ताम्रपत्र सम्मानित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी माना जाता है।

लाल कुमार सिंह चंदेल का जन्म 14 अगस्त 1907 को वर्दी रियासत के खटाई गांव में हुआ था। उनके पिता लाल त्रिभुवन प्रताप सिंह थे। खटाई में प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने कालाकांकर में आगे की पढ़ाई की। कालाकांकर का राजपरिवार स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा था और गांधी-नेहरू परिवार तथा कांग्रेस से उसके करीबी संबंध थे। वर्ष 1931 में महात्मा गांधी के कालाकांकर आगमन के दौरान विदेशी वस्त्रों की होली जलाई गई थी। लाल कुमार सिंह भी इस आयोजन में शामिल हुए थे।
वर्ष 1932 में प्रतापगढ़ में स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण उन्हें गिरफ्तार कर 14 महीने तक जेल में रखा गया। इसके बाद 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में दोबारा गिरफ्तारी हुई और उन्हें 18 महीने की सजा सुनाई गई। उन्होंने लखनऊ जेल में सजा काटी। इस तरह स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने करीब 32 महीने जेल में बिताए।

लाल कुमार सिंह ने आजादी से पहले कांग्रेस के लखनऊ, कोलकाता और लाहौर अधिवेशनों में भाग लिया था। डॉ. शंकर दयाल शर्मा के मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष रहने के दौरान वे प्रांतीय कार्यकारिणी के सदस्य भी रहे। कालाकांकर में रहते हुए उनका संपर्क अमेठी रियासत के तत्कालीन नरेश रणंजय सिंह और राजा अवधेश सिंह के परिवार से रहा। राजा दिनेश सिंह के साथ भी उनके आजीवन संबंध बने रहे।

आजादी के बाद वर्ष 1952 में वे अपने पैतृक क्षेत्र लौट आए। उन्होंने स्वतंत्रता सेनानी बैजनाथ दुबे और नरेंद्र सिंह के साथ मिलकर छुआछूत उन्मूलन अभियान चलाया तथा देवसर में बड़ा सामाजिक आयोजन किया। वर्ष 1962 में भारत-चीन युद्ध के दौरान प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की अपील पर उन्होंने 25 ग्राम सोना राष्ट्रीय कोष में दान किया।

सहकारिता के क्षेत्र में भी उन्होंने उल्लेखनीय काम किया। जिला केंद्रीय सहकारी बैंक सीधी की स्थापना के समय उन्हें प्रथम अध्यक्ष बनाया गया। इस दौरान उन्होंने आदिवासी अंचलों में सहकारी समितियों के गठन और सहकारी आंदोलन को मजबूत करने में योगदान दिया।

2 फरवरी 1986 को 80 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। जीवनभर खादी पहनने और गांधीवादी विचारों पर चलने वाले लाल कुमार सिंह का जीवन स्वतंत्रता संग्राम, सामाजिक समरसता और जनसेवा को समर्पित रहा। उनके ज्येष्ठ पुत्र दिवाकर सिंह भारतीय सेना से सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में उनके पौत्र राजेश प्रताप सिंह ‘रज्जू’ कांग्रेस पार्टी में सक्रिय हैं। खटाई रियासत से पूर्वजों को हिस्से में मिली दुधमनिया की जागीर में आज भी परिवार की आबादी है।

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