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किराएदार मकान मालिक को यह नहीं बता सकता कि वह कहां कारोबार करे – सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली।मकान मालिक और किराएदार के बीच विवाद से जुड़े एक अहम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कोई भी किराएदार मकान मालिक को यह निर्देश नहीं दे सकता कि उसके लिए कौन सा वैकल्पिक परिसर उपयुक्त है या वह अपना व्यवसाय कहां शुरू करे। अदालत ने यह भी कहा कि जब निचली अदालतें मकान मालिक की वास्तविक आवश्यकता को स्वीकार कर चुकी हों, तब हाईकोर्ट अपने पुनरीक्षण अधिकार में जाकर सबूतों की गहराई से दोबारा जांच नहीं कर सकता।यह टिप्पणी जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने की। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत द्वारा दिए गए बेदखली के फैसले को पलट दिया गया था।

निचली अदालतों के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने माना सही

मामला मुंबई के कमाठीपुरा, नागपाड़ा स्थित एक गैर-आवासीय परिसर से जुड़ा था। मकान मालिक ने अपनी बहू की व्यावसायिक जरूरत के आधार पर किराएदार से परिसर खाली कराने की मांग की थी।ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत दोनों ने माना कि मकान मालिक की जरूरत वास्तविक और ईमानदार है, इसलिए बेदखली का आदेश दिया गया।हालांकि किराएदार की याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने निचली अदालतों के फैसले पलट दिए थे। इसके खिलाफ मकान मालिक सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को गलत करार देते हुए रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने अपनी सीमा से बाहर जाकर जांच की – सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षण अधिकारों की सीमा पार करते हुए सबूतों की गहराई से जांच की, जबकि ऐसा तभी किया जा सकता है जब निचली अदालतों ने स्पष्ट रूप से अधिकारों का दुरुपयोग किया हो। इस मामले में ऐसा नहीं था।

किराएदार की दलीलें खारिज

किराएदार ने तर्क दिया था कि मकान मालिक के पास दूसरी और तीसरी मंजिल पर आवासीय जगह और ग्राउंड फ्लोर पर एक कमरा उपलब्ध था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ यह तथ्य कि किसी कमरे के लिए कमर्शियल बिजली कनेक्शन लिया गया, मकान मालिक की व्यावसायिक जरूरत को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता।अदालत ने भूपिंदर सिंह बावा बनाम आशा देवी (2016) के फैसले का हवाला देते हुए दोहराया कि किराएदार यह तय नहीं कर सकता कि मकान मालिक अपने व्यवसाय के लिए कौन सा परिसर चुने।इस फैसले को मकान मालिकों के अधिकारों को मजबूती देने वाला अहम निर्णय माना जा रहा है।

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