सिंगरौली नगर निगम में सियासी घमासान: अविश्वास प्रस्ताव के खेल में आरोप-प्रत्यारोप का दौर

सिंगरौली, : सिंगरौली नगर निगम में राजनीतिक हलचल अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडेय के खिलाफ लाए गए अविश्वास प्रस्ताव को लेकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर तेज हो गया है। हाल ही में महापौर रानी अग्रवाल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर उन पर लगे भ्रष्टाचार और अविश्वास प्रस्ताव से जुड़ी सभी आरोपों को खारिज किया। महापौर ने आरोप लगाया कि उन पर झूठे आरोप लगाए जा रहे हैं और यह सब एक सियासी साजिश का हिस्सा है।
अविश्वास प्रस्ताव से नाम वापस लेने वाले पार्षदों पर निशाना
महापौर रानी अग्रवाल ने कहा कि जिन पार्षदों ने अविश्वास प्रस्ताव से अपना नाम वापस लिया है, वे अब उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगा रहे हैं, जबकि खुद उन्होंने पहले कलेक्टर के पास शपथ पत्र देकर अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन किया था। रानी अग्रवाल का दावा है कि यह कदम उनके खिलाफ हार्स ट्रेडिंग और डर्टी पॉलिटिक्स की ओर इशारा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि इन पार्षदों ने उच्च न्यायालय का समय बर्बाद किया है, जो कि गलत है।
पार्षदों के आरोप और महापौर का पलटवार
इस दौरान, अविश्वास प्रस्ताव के खिलाफ खड़े होने वाले पार्षदों ने भी महापौर पर गंभीर आरोप लगाए। पार्षद अनिल शाह ने कहा कि जब उच्च न्यायालय ने कलेक्टर को 30 दिन में अविश्वास प्रस्ताव की प्रक्रिया पूरी करने का आदेश दिया था, तो उनके ही साथी पार्षद अचानक से पीछे हट गए। इस बदलाव से पार्षदों को चिंता हो रही थी, लेकिन उन्होंने फैसला किया कि वे जनता के विश्वास को बचाने के लिए अब पीछे नहीं हटेंगे।
पार्षद अखिलेश सिंह का बयान
पार्षद अखिलेश सिंह ने भी महापौर पर आरोप लगाए कि अविश्वास प्रस्ताव उन्हीं के कहने पर लाया गया था। उनका कहना है कि महापौर ने शर्त रखी थी कि अगर उनकी पार्टी के 10 पार्षदों को एमआईसी में शामिल किया जाता है, तो वे अविश्वास प्रस्ताव को समर्थन देंगे। हालांकि, बाद में महापौर ने अपनी शर्तें बदल दीं, जिसके कारण पार्षदों को लगा कि महापौर का उद्देश्य जनता के हित से ज्यादा सियासी फायदा उठाना है।
“खरीद-फरोख्त” के आरोपों में नए खुलासे
इस मामले में वार्ड-7 के पार्षद ने भी आरोप लगाया कि अविश्वास प्रस्ताव से पीछे हटने वाले पार्षदों ने खरीद-फरोख्त की प्रक्रिया अपनाई। पार्षद ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ अपने निजी लाभ के लिए अविश्वास प्रस्ताव से पीछे हट गए, जो कि जनता के हितों के खिलाफ है। उन्होंने पार्षद रामगोपाल पाल पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप भी लगाए और कहा कि यह मामला गहरे सियासी खेल का हिस्सा है।
नगर निगम का विकास और राजनीति
महापौर रानी अग्रवाल ने यह भी कहा कि उनके कार्यकाल के दौरान नगर निगम में विकास कार्यों को प्रोत्साहन मिला है, और वाडों में करोड़ों का विकास कार्य हो रहा है। उनका कहना है कि भाजपा के पूर्व महापौर के मुकाबले उनके कार्यकाल में नगर निगम की स्थिति में सुधार हुआ है। हालांकि, पिछले 9 महीनों से परिषद की बैठक नहीं हो रही है, जिससे पार्षदों को अपनी समस्याओं को हल करने का मौका नहीं मिल रहा है।
संकट की ओर बढ़ता नगर निगम
यह विवाद सिंगरौली नगर निगम के विकास के लिए एक संकट बनता जा रहा है। सियासी प्रतिद्वंद्विता और आरोप-प्रत्यारोप के बीच विकास कार्यों को रोकने की स्थिति उत्पन्न हो गई है। पार्षदों का मानना है कि अगर यह सियासी घमासान इसी तरह जारी रहा, तो नगर निगम का विकास ठप हो सकता है।
आगे क्या होगा?
अब यह देखना दिलचस्प होगा कि उच्च न्यायालय के आदेश और पार्षदों के इस खेल के बाद सिंगरौली नगर निगम की राजनीति किस दिशा में जाती है। क्या विकास कार्यों में तेजी आएगी या सियासी विवादों के कारण नगर निगम की गतिविधियां और रुक जाएंगी, यह आने वाले दिनों में स्पष्ट होगा।













