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महाकाल के सामने कोई वीआईपी नहीं: गर्भगृह प्रवेश याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप से इनकार

उज्जैन।मध्य प्रदेश के उज्जैन स्थित प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के गर्भगृह में वीआईपी प्रवेश को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से इनकार कर दिया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाकाल के सामने कोई वीआईपी नहीं होता और गर्भगृह में प्रवेश से जुड़े नियम तय करना मंदिर प्रशासन का अधिकार क्षेत्र है, इसमें न्यायालय हस्तक्षेप नहीं करेगा।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वे अपनी मांग मंदिर प्रशासन के समक्ष रखें। कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“महाकाल के सामने सभी समान हैं। गर्भगृह में कौन प्रवेश करेगा, इसका निर्णय मंदिर समिति और जिला प्रशासन को करना है। अदालत इसमें दखल क्यों दे?”

याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया था कि पिछले करीब ढाई वर्षों से आम श्रद्धालुओं के लिए गर्भगृह में प्रवेश बंद है, जबकि इस दौरान वीआईपी और प्रभावशाली लोगों को नियमों का उल्लंघन कर अंदर जाने की अनुमति दी जाती रही है। उनका कहना था कि यह स्थिति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है।

गौरतलब है कि इससे पहले अगस्त 2025 में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ ने भी इसी तरह की याचिका को खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने कहा था कि गर्भगृह में प्रवेश को लेकर निर्णय लेने का अधिकार उज्जैन जिला कलेक्टर और महाकाल मंदिर प्रशासन के पास है और अदालत इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

कोरोना काल के बाद से महाकाल मंदिर के गर्भगृह में आम श्रद्धालुओं के प्रवेश पर रोक लगी हुई है। वर्तमान में भक्त बाहरी क्षेत्र से ही भगवान महाकाल के दर्शन कर रहे हैं। हालांकि, समय-समय पर वीआईपी नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को विशेष अनुमति मिलने की खबरों के चलते आम श्रद्धालुओं में असंतोष भी देखा गया है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब याचिकाकर्ता को मंदिर प्रशासन से ही संवाद करना होगा। साथ ही, इस निर्णय से मंदिर प्रशासन पर नियमों को पारदर्शी और समान रूप से लागू करने का नैतिक दबाव भी बढ़ गया है।

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