नाता विवाह को मिली कानूनी मान्यता, पारिवारिक पेंशन पर राजस्थान हाई कोर्ट का अहम फैसला
पेंशन कोई खैरात नहीं, बल्कि मौलिक अधिकार है : अदालत

जोधपुर।राजस्थान उच्च न्यायालय ने पारिवारिक पेंशन के अधिकार को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने राज्य में प्रचलित सामाजिक परंपरा नाता विवाह को कानूनी मान्यता देते हुए स्पष्ट किया है कि इस विवाह से जुड़ी महिलाएं भी पारिवारिक पेंशन की समान हकदार होंगी। हाई कोर्ट ने कहा कि पेंशन कोई दया या खैरात नहीं है, जिसे सरकार अपनी मर्जी से दे या रोके, बल्कि यह कर्मचारी द्वारा अर्जित संपत्ति है और मौलिक अधिकार के दायरे में आती है।यह फैसला न्यायमूर्ति गणेश राम मीणा की एकल पीठ ने सुनाया।
24 साल से पेंशन से वंचित रही विधवा का मामला
मामला एक पटवारी की विधवा से जुड़ा है, जिसे बीते 24 वर्षों से फैमिली पेंशन और डेथ ग्रेच्युटी से वंचित रखा गया था। याचिकाकर्ता के पति की नियुक्ति वर्ष 1989 में विधिवत चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी। हालांकि, नियुक्ति पत्र में पद को पूर्णतः अस्थायी बताया गया था। पटवारी ने एक वर्ष से अधिक समय तक निरंतर सेवा दी, लेकिन 1990 में उनका निधन हो गया।
राज्य सरकार ने विधवा को अनुकंपा नियुक्ति तो प्रदान कर दी, जिससे यह स्पष्ट हो गया कि मृतक को नियमित कर्मचारी के रूप में माना गया, लेकिन जब फैमिली पेंशन की बात आई तो सरकार ने यह कहते हुए दावा खारिज कर दिया कि प्रारंभिक नियुक्ति अस्थायी थी।
अस्थायी नियुक्ति के नाम पर अधिकार नहीं छीना जा सकता
अदालत ने राजस्थान सेवा नियम, 1951 के नियम 268-ए का विस्तार से विश्लेषण किया। इस नियम के अनुसार, यदि किसी सरकारी कर्मचारी ने एक वर्ष से अधिक की सेवा पूरी कर ली है, तो उसके आश्रित फैमिली पेंशन के पात्र होते हैं, चाहे कर्मचारी की नियुक्ति अस्थायी हो या स्थायी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मृतक का चयन एक औपचारिक चयन समिति के माध्यम से हुआ था, इसलिए केवल नियुक्ति पत्र में “अस्थायी” शब्द लिखे होने के आधार पर उसके परिवार के वैधानिक अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता।
देरी का बहाना बनाकर हक से वंचित नहीं किया जा सकता
राज्य सरकार की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि याचिका दाखिल करने में 24 वर्षों की देरी हुई है। इस पर हाई कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पेंशन आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण माध्यम है और यह निरंतर जारी रहने वाला अधिकार है। यदि राज्य अपनी वैधानिक जिम्मेदारी निभाने में विफल रहता है, तो वह नागरिक को देरी के आधार पर दंडित नहीं कर सकता।
कोर्ट का अंतिम आदेश
राजस्थान हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि वह याचिकाकर्ता को फैमिली पेंशन और डेथ ग्रेच्युटी का पूरा बकाया तत्काल जारी करे। इसके साथ ही, दशकों तक आर्थिक तंगी झेलने को देखते हुए अदालत ने 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का भी आदेश दिया है। यह ब्याज उस तिथि से लागू होगा, जब से विधवा पेंशन की हकदार थी।
फैसले का व्यापक असर
इस फैसले को न केवल नाता विवाह से जुड़ी महिलाओं के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, बल्कि यह निर्णय पेंशन को लेकर सरकारों की मनमानी पर भी स्पष्ट अंकुश लगाता है। अदालत ने यह साफ संदेश दिया है कि सामाजिक प्रथाओं को नजरअंदाज कर किसी के वैधानिक और मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता।













