देश विदेशबड़ी खबरब्रेकिंग न्यूज़

सिंधु जल संधि पर भारत का दोटूक रुख, आतंकवाद बंद होने तक रहेगी स्थगित

 

नई दिल्ली, संवाददाता। भारत ने सिंधु जल संधि (आईडब्ल्यूटी) को लेकर अपना रुख एक बार फिर स्पष्ट करते हुए कहा है कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद को पूरी तरह और विश्वसनीय तरीके से समाप्त नहीं करता, तब तक संधि स्थगित रहेगी। विदेश मंत्रालय ने यह प्रतिक्रिया पाकिस्तान द्वारा चिनाब-ब्यास लिंक टनल परियोजना तथा सलाल बांध जलाशय से गाद निकालने की भारत की योजनाओं पर आपत्ति जताए जाने के बाद दी है।

पाकिस्तान ने आरोप लगाया था कि भारत जल संसाधनों का उपयोग दबाव बनाने के लिए कर रहा है। इस पर विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रंधीर जायसवाल ने साप्ताहिक मीडिया ब्रीफिंग में कहा कि भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित कर रखा है और यह निर्णय तब तक प्रभावी रहेगा, जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने के लिए ठोस और विश्वसनीय कदम नहीं उठाता।

जम्मू-कश्मीर में स्विट्जरलैंड के राजदूत की यात्रा पर पाकिस्तान की टिप्पणी को खारिज करते हुए जायसवाल ने कहा कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और किसी भी देश के राजदूत को वहां यात्रा करने की पूर्ण स्वतंत्रता है।

इस बीच भारत ने पिछले महीने सिंधु जल संधि, 1960 के तहत कथित रूप से गठित मध्यस्थता न्यायालय (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) के फैसले को भी सिरे से खारिज कर दिया था। विदेश मंत्रालय के अनुसार 15 मई 2026 को जारी यह फैसला भारत के लिए कानूनी रूप से मान्य नहीं है, क्योंकि भारत ने इस न्यायाधिकरण के गठन को कभी स्वीकार ही नहीं किया। मंत्रालय ने कहा कि ऐसे किसी भी न्यायाधिकरण की कार्यवाही, आदेश या निर्णय भारत की दृष्टि में शून्य और अवैध हैं।

गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान के बीच 19 सितंबर 1960 को हस्ताक्षरित सिंधु जल संधि सिंधु नदी प्रणाली की नदियों के जल बंटवारे और उपयोग से संबंधित है। भारत ने पिछले वर्ष पहलगाम आतंकी हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत अपने संप्रभु अधिकारों का प्रयोग करते हुए इस संधि को स्थगित करने का निर्णय लिया था।

भारत का कहना है कि जब तक पाकिस्तान आतंकवाद को समर्थन देना स्थायी और विश्वसनीय रूप से बंद नहीं करता, तब तक संधि को बहाल नहीं किया जाएगा। विदेश मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि संधि के स्थगन काल में भारत उस समझौते के तहत निर्धारित दायित्वों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है।

भारत ने इससे पहले किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़े मामलों में भी कथित मध्यस्थता न्यायालय के निर्णयों को अस्वीकार करते हुए कहा था कि यह पूरी प्रक्रिया सिंधु जल संधि की मूल भावना और प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। भारत का आरोप है कि पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों का उपयोग कर अपनी जवाबदेही से बचने का प्रयास करता रहा है और यह मध्यस्थता प्रक्रिया भी उसी रणनीति का हिस्सा है।

Author

Related Articles

Back to top button