
चुनाव पूर्व सरकारी खजाने से मतदाताओं को साधने होता है नकद हस्तांतरण?
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भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों से ठीक पहले केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा मतदाताओं को नकद हस्तांतरण (कैश ट्रांसफर) योजनाओं का सिलसिला जारी रहा है। खासतौर पर महिलाओं और किसानों को लक्षित कर इन योजनाओं की घोषणा की गई, जिन्हें विपक्ष अक्सर चुनावी रिश्वत कहता रहा है। साल 2024 से सितंबर 2025 तक की अवधि में करीब 55,000 करोड़ रुपए से अधिक सीधे लाभार्थियों को वितरित किए गए।
जानकारी अनुसार लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि की 16वीं किस्त फरवरी 2024 में जारी की गई थी। करीब 11 करोड़ किसानों को 2,000-2,000 रुपए की किस्त दी गई, जिसकी कुल राशि 22,000 करोड़ रुपए रही। केंद्र सरकार ने इसके अलावा मुफ्त अनाज योजना को भी आगे बढ़ाया, हालांकि वह नकद हस्तांतरण की श्रेणी में नहीं आता।
महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (नवंबर 2024) से कुछ माह पहले मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना जून 2024 में शुरू की गई। इसके तहत 21 से 60 वर्ष की महिलाओं को 1,500 रुपए मासिक मिलना शुरू हुआ। जुलाई से नवंबर तक लगभग 2.3 करोड़ महिलाओं को इसका लाभ मिला और करीब 17,000 करोड़ रुपए खर्च हुए।
झारखंड चुनाव (नवंबर 2024) से पहले अगस्त 2024 में मुख्यमंत्री मैया सम्मान योजना लाई गई। 18 से 50 वर्ष की महिलाओं को शुरुआती रूप से 1,000 रुपए प्रति माह दिए गए। चुनाव से पहले दो किश्तों के रूप में लगभग 700 से 1,400 रुपए वितरित हुए। बाद में इसे बढ़ाकर 2,500 रुपए मासिक कर दिया गया।
हरियाणा चुनाव (अक्टूबर 2024) से पहले कोई बड़ा नकद हस्तांतरण नहीं हुआ। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में महिलाओं को 2,100 रुपए मासिक देने का वादा किया था, लेकिन वास्तविक वितरण 2025 में दीन दयाल लाडो लक्ष्मी योजना के रूप में शुरू हुआ।
दिल्ली विधानसभा चुनाव (फरवरी 2025) से पहले मुख्यमंत्री महिला सम्मान योजना दिसंबर 2024 में लॉन्च की गई। इसमें 18 वर्ष से अधिक आयु की महिलाओं को 1,000 रुपए मासिक दिए गए। तीन माह में लगभग 70 लाख महिलाओं को 2,100 करोड़ रुपए का वितरण हुआ।
बिहार विधानसभा चुनाव (अक्टूबर-नवंबर 2025) से पहले सितंबर 2025 में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना शुरू हुई। इसके तहत महिलाओं को एकमुश्त 10,000 रुपए दिए जा रहे हैं। 75 लाख महिलाओं को लक्षित कर करीब 7,500 करोड़ रुपए की राशि चुनाव से ठीक पहले बांटी जा रही है।
कुल मिलाकर, केंद्र स्तर पर लगभग 25,000 करोड़ और राज्यों के स्तर पर 30,000 करोड़ रुपए से अधिक नकद रूप में मतदाताओं तक पहुंचे। सरकारें इसे महिला सशक्तिकरण और किसान कल्याण बताती हैं, जबकि आलोचक इसे चुनावी राजनीति से जोड़ते हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार इस तरह से चुनाव पूर्व नकद राशि ट्रांसफर करके मतदाताओं को रिझाने का काम बहुतायत में करती है, जिसका असर आने वाले चुनावों में देखने को मिलता है।
विश्लेषकों की मानें तो यदि सरकार को इस तरह की योजनाएं चलानी ही हैं तो सरकार बनते ही क्यों नहीं चलाई जातीं, अंतिम समय जब चुनाव होने होते हैं, तभी क्यों लाई जाती हैं? इससे हाल ही में होने जा रहे चुनाव को साधने की बू आती है।













