
पोल खोल पोस्ट / सुप्रीम कोर्ट में गैरसरकारी संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) की याचिका पर सुनवाई चल रही है। एडीआर ने वोटर्स के नाम काटने के आरोप लगाए हैं।
शीर्ष अदालत में एडीआर की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण के लिए उस वक्त असहज स्थिति पैदा हो गई, जब एनजीओ की ओर से पेश हलफनामे में झूठ उजागर हुई। मामले की सुनवाई कर रही दो जजों की पीठ ने प्रशांत भूषण से कहा कि उन्हें इस झूठ की जिम्मेदारी लेनी ही होगी। कोर्ट ने इसके साथ ही योगेंद्र यादव की ओर से पेश डेटा के आधार पर कहा कि यह समस्या नहीं, बल्कि संकट है।
सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने कहा, ‘कोर्ट आपके साथ होता यदि आपने उन लोगों का विवरण दिया होता, जिनके नाम बिना किसी सूचना के फाइनल वोटर लिस्ट से हटा दिए गए हैं। हम उन हालात में भी आपके साथ होते यदि ऐसे किसी वोटर की अपील को बिना प्रॉपर सुनवाई के निपटा दिया गया होता। हम तब हस्तक्षेप कर सकते थे। आपकी ओर से एक भी उदाहरण क्यों नहीं दिया गया? ऐसा लगता है कि इसमें उत्साह ज्यादा है, लेकिन वजहें कम।
हालांकि, पीठ ने यह सुनिश्चित किया कि प्रक्रिया का पालन किए बिना मतदाता सूची से कोई भी नाम नहीं हटाया जाए और डीएलएसए को निर्देश दिया कि वे बूथ स्तर के अधिकारियों से उन लोगों के बारे में पूछताछ करने के लिए वॉलेंटियर को तैनात करें जिनके नाम 3.75 लाख की डिलीटेड लिस्ट में है।
दरअसल, एडीआर ने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि बिहार में बिना किसी सूचना के वोटर्स के नाम सूची से डिलीट कर दिए गए। इसको लेकर एडीआर की तरफ से कोर्ट में हलफनामे भी दाखिल किए गए। इसमें झूठ उजागर हुआ है। मामले की सुनवाई जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ कर रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, एडीआर की ओर से प्रशांत भूषण ने हलफनामा पेश किया था। अब इसमें झूठ पाए जाने पर कोर्ट ने याची को कड़ी फटकार लगाते हुए प्रशांत भूषण से कहा कि आपको इस झूठ की जिम्मेदारी लेनी ही होगी। इसपर प्रशांत भूषण ने कहा कि इसकी सत्यता की जांच कराई जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ इसपर और नाराज हो गई। बेंच ने कहा, ‘झूठे हलफनामे का अनुभव मिलने के बाद हम इनपर कैसे भरोसा कर सकते हैं? हमारा काम इन्क्वायरी करना नहीं है।
योगेंद्र यादव ने कोर्ट में दलील दी कि बिहार की मतदाता सूची में एसआईआर प्रक्रिया का दुरुपयोग कर बड़ी संख्या में खासकर महिलाओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया के चलते लगभग 80 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं।
हालांकि, कोर्ट ने यादव के प्रेजेंटेशन पर टिप्पणी करते हुए कहा कि साल 2023 तक बिहार में मतदाताओं की संख्या राज्य की वयस्क आबादी से 105 प्रतिशत तक पहुंच गई थी। यह कोई सामान्य समस्या नहीं, बल्कि एक संकट था। योगेंद्र यादव ने सुझाव दिया कि चुनाव आयोग को डुप्लिकेट नाम हटाने के लिए सॉफ्टवेयर का प्रयोग करना चाहिए।













