अपराधी कितना भी डीपफेक का आवरण ओढ़े, उसे खोज निकालेंगे : सीएम योगी
‘टेक संगम 2026’ में मुख्यमंत्री का बयान, फॉरेंसिक विज्ञान और एआई से मजबूत होगी अपराधों की जांच; 18 पुलिस रेंजों में बन रहीं फॉरेंसिक लैब

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डीपफेक जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल कर अपराधी भले ही अपनी पहचान छिपाने की कोशिश करें, लेकिन प्रदेश की वैज्ञानिक जांच और विधिक व्यवस्था उन्हें खोज निकालने में सक्षम होगी। उन्होंने कहा कि एआई मददगार हो सकता है, लेकिन उसे निर्णायक नहीं बनना चाहिए। तकनीक का संचालन मानव विवेक से होना चाहिए, न कि मनुष्य को पूरी तरह तकनीक पर निर्भर हो जाना चाहिए।
मुख्यमंत्री शनिवार को लखनऊ स्थित उत्तर प्रदेश स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस में आयोजित 3 दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन ‘टेक संगम 2026’ के दूसरे दिन कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे थे। इस अवसर पर उन्होंने क्वांटम फॉरेंसिक्स और विधिक अनुपालन के लिए ‘एलईएक्सक्यू सेंटर ऑफ एक्सीलेंस’ का शुभारंभ किया। इसके साथ ही कंसेंट मैनेजमेंट पोर्टल लॉन्च किया, ‘अभेद्य’ परियोजना की आधारशिला रखी और ‘एआई इन कंस्ट्रक्शन’ पुस्तक का अनावरण किया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्यों, फॉरेंसिक जांच और आधुनिक तकनीक के समन्वय से अपराध अनुसंधान को प्रभावी बनाया जा सकता है। इससे न्याय मिलने में होने वाली देरी को कम करने में भी मदद मिलेगी।
18 पुलिस रेंजों में विकसित हो रहीं फॉरेंसिक लैब
योगी आदित्यनाथ ने बताया कि नए आपराधिक कानूनों के तहत 7 वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाने पर विशेष जोर दिया गया है। इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उत्तर प्रदेश की सभी 18 पुलिस रेंजों में फॉरेंसिक लैब विकसित की जा रही हैं। इनमें 12 लैब तैयार हो चुकी हैं, जबकि 6 अन्य अंतिम चरण में हैं।
उन्होंने बताया कि प्रदेश में 150 से अधिक फॉरेंसिक वैन भी तैनात की गई हैं। इनकी मदद से घटनास्थल पर पहुंचकर वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने और विवेचना को मजबूत करने में सहायता मिलेगी। सरकार का उद्देश्य है कि अपराधों की जांच वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर हो और न्यायालयों में मामलों के निस्तारण में अनावश्यक देरी कम की जा सके।
डीएनए और फिंगरप्रिंट से खुलते हैं अपराध के राज
फॉरेंसिक विज्ञान की उपयोगिता समझाते हुए मुख्यमंत्री ने लोकप्रिय टीवी सीरियल ‘सीआईडी’ का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि लोग पहले टेलीविजन पर देखते थे कि एक बाल या फिंगरप्रिंट के आधार पर अपराधी तक कैसे पहुंचा जाता है। आज आधुनिक फॉरेंसिक तकनीक की मदद से वास्तविक जीवन में भी इस तरह की वैज्ञानिक जांच संभव हो रही है।
मुख्यमंत्री ने एक आपराधिक मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि एक माफिया ने 1980 में पहला अपराध किया था, लेकिन साक्ष्यों के अभाव और डीएनए नमूने नष्ट होने के कारण उसे 2022 में, यानी 42 वर्ष बाद सजा मिल सकी। उन्होंने कहा कि यह उदाहरण बताता है कि समय पर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाना कितना महत्वपूर्ण है।
उनके अनुसार, यदि घटनास्थल से साक्ष्य समय रहते सुरक्षित कर लिए जाएं और उनकी वैज्ञानिक जांच हो, तो अपराधियों तक पहुंचने तथा अदालत में आरोपों को साबित करने में मदद मिल सकती है।
डीपफेक के दौर में तकनीक के साथ मानवीय विवेक जरूरी
मुख्यमंत्री ने कहा कि एआई और डीपफेक जैसी तकनीकों के बढ़ते इस्तेमाल के बीच अपराधों की जांच के तरीके भी आधुनिक बनाने होंगे। तकनीक का उपयोग तथ्यों की पड़ताल और साक्ष्यों के विश्लेषण में किया जा सकता है, लेकिन केवल एआई से प्राप्त निष्कर्षों को अंतिम सत्य नहीं माना जाना चाहिए।
उन्होंने चेताया कि पूरी तरह एआई पर निर्भरता भविष्य में संकट पैदा कर सकती है। तकनीकी निष्कर्षों की जांच, उनकी विश्वसनीयता का मूल्यांकन और कानून के अनुरूप उनका इस्तेमाल जरूरी है। वैज्ञानिक साक्ष्य और मानवीय विवेक के बीच संतुलन ही प्रभावी जांच का आधार होना चाहिए।
कानून और प्रयोगशाला के समन्वय पर जोर
मुख्यमंत्री ने ‘लॉ विद लैब्स’ यानी कानून और प्रयोगशाला के समन्वय की अवधारणा को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि विज्ञान और कानून को एक-दूसरे का पूरक बनना होगा। वैज्ञानिक जांच से प्राप्त साक्ष्य तभी प्रभावी होंगे, जब उन्हें विधिक प्रक्रिया के अनुरूप जुटाया और न्यायालय में प्रस्तुत किया जाए।
इसी उद्देश्य से शुरू किए गए एलईएक्सक्यू सेंटर ऑफ एक्सीलेंस के माध्यम से क्वांटम तकनीक को कानून, सुरक्षा और फॉरेंसिक विज्ञान से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा। केंद्र में क्वांटम फॉरेंसिक्स, विधिक अनुपालन, अनुसंधान और तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा देने पर काम होगा।
वर्ष 2030 तक 5 गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता का लक्ष्य
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान दौर में डेटा और तकनीक विकास के प्रमुख आधार बन चुके हैं। उत्तर प्रदेश को एआई और डेटा सेंटर के प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित करने की दिशा में काम किया जा रहा है। राज्य सरकार का लक्ष्य वर्ष 2030 तक प्रदेश में 5 गीगावाट डेटा सेंटर क्षमता विकसित करना है। इसके लिए 5 बड़े डेटा सेंटर क्लस्टर विकसित करने की योजना पर भी काम हो रहा है।
उन्होंने नोएडा में उत्तर भारत की पहली सेमीकंडक्टर फैब यूनिट स्थापित किए जाने का उल्लेख करते हुए कहा कि डेटा सेंटर, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में निवेश से प्रदेश की तकनीकी क्षमताओं को मजबूती मिलेगी।
मुख्यमंत्री ने औद्योगिक विकास का उल्लेख करते हुए दावा किया कि वर्ष 1947 से 2017 तक उत्तर प्रदेश में लगभग 14 हजार उद्योग स्थापित हुए थे, जबकि 2017 के बाद 35 हजार नए उद्योग लगे हैं। उन्होंने प्रदेश में करीब 75 हजार एकड़ का लैंड बैंक और 50 लाख करोड़ रुपये के निवेश प्रस्ताव प्राप्त होने की भी जानकारी दी।
फॉरेंसिक संस्थान में आधुनिक तकनीक की सुविधाएं
संस्थान के संस्थापक निदेशक डॉ. जी.के. गोस्वामी ने इसकी स्थापना और उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 1 अगस्त 2021 को संस्थान की आधारशिला रखी थी। संस्थान में डीएनए, साइबर और डिजिटल फॉरेंसिक्स सहित आधुनिक तकनीकी प्रयोगशालाएं विकसित की गई हैं।
उन्होंने बताया कि एआई, रोबोटिक्स और अन्य उभरती तकनीकों के माध्यम से अपराध अनुसंधान को मजबूत करने पर काम किया जा रहा है। संस्थान अब तक पुलिस, रक्षा बलों और प्रशासन से जुड़े 5 हजार से अधिक अधिकारियों को प्रशिक्षण दे चुका है।
पुलिस महानिदेशक राजीव कृष्ण ने साइबर बुलिंग, डिजिटल साक्ष्य और अपराध स्थल प्रबंधन जैसे विषयों पर चर्चा करते हुए आधुनिक फॉरेंसिक क्षमताओं के विकास में संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डाला।
राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौते
सम्मेलन के दौरान शिक्षा, तकनीक, फॉरेंसिक विज्ञान और कौशल विकास के क्षेत्र में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के साथ समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए। इनमें यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलिस, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर, सैन्स इंस्टीट्यूट, उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन, नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ इलेक्ट्रॉनिक्स एंड इंफॉर्मेशन टेक्नोलॉजी, डायरेक्टरेट ऑफ फॉरेंसिक साइंस सर्विसेज, डिजिटल इंडिया कॉर्पोरेशन, सॉफ्टवेयर टेक्नोलॉजी पार्क्स ऑफ इंडिया और सी-डैक शामिल हैं।
अमेरिका स्थित यूनिवर्सिटी ऑफ इंडियानापोलिस की अध्यक्ष प्रो. तनुजा सिंह ने उत्तर प्रदेश में एआई और साइबर तकनीक के क्षेत्र में हो रहे कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि प्रदेश के विद्यार्थियों में भविष्य की तकनीकी जरूरतों को पूरा करने की क्षमता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक अनुसंधान और कानून के समन्वय से अपराधों की जांच को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। डीपफेक और साइबर अपराधों की चुनौतियों के बीच फॉरेंसिक विज्ञान की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है।













