मद्रास हाईकोर्ट का अहम फैसला: श्रीमद्भगवद्गीता धार्मिक ग्रंथ नहीं, एफसीआरए पंजीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता

चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि श्रीमद्भगवद्गीता को केवल धार्मिक ग्रंथ मानकर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि गीता जीवन मूल्यों, नैतिकता और कर्म के सिद्धांतों की शिक्षा देती है और यह भारतीय सभ्यता का अभिन्न हिस्सा है। इसलिए केवल गीता और योग की शिक्षा देने के आधार पर किसी ट्रस्ट को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) के तहत पंजीकरण से वंचित नहीं किया जा सकता।
यह फैसला तमिलनाडु के कोयंबटूर स्थित अर्शा विद्या परंपरा ट्रस्ट से जुड़े मामले में आया है। केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय ने यह कहते हुए ट्रस्ट का एफसीआरए आवेदन खारिज कर दिया था कि उसकी गतिविधियां धार्मिक प्रकृति की हैं, इसलिए विदेशी फंडिंग की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस निर्णय को ट्रस्ट ने मद्रास हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन ने कहा कि श्रीमद्भगवद्गीता को केवल धर्म के दायरे में सीमित करना उसकी दार्शनिक और नैतिक व्यापकता को कमतर आंकना है। कोर्ट ने माना कि गीता मनुष्य के कर्तव्य, कर्म और जीवन मूल्यों पर आधारित ग्रंथ है, जो किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। इसलिए इसे पढ़ाने या प्रचारित करने वाली संस्था को स्वतः धार्मिक संगठन नहीं कहा जा सकता।
अदालत ने यह भी कहा कि गृह मंत्रालय का यह तर्क कि गीता, उपनिषद, वेदांत और संस्कृत के शिक्षण से ट्रस्ट धार्मिक हो जाता है, एफसीआरए की धारा 11 की कसौटी पर खरा नहीं उतरता। कोर्ट ने मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह ट्रस्ट के एफसीआरए आवेदन पर नए सिरे से विचार करे और केवल “धार्मिक” टैग के आधार पर किसी संस्था को विदेशी फंडिंग से वंचित न किया जाए।
ट्रस्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीचरण रंगराजन और अधिवक्ता मोहम्मद आशिक ने पक्ष रखा, जबकि केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एआरएल सुंदरेशन ने बहस की। यह फैसला गीता और भारतीय दर्शन से जुड़ी संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर माना जा रहा है।













