मध्य प्रदेशसिंगरौली

सिंगरौली नगर निगम की बैठक में महापौर–कमिश्नर आमने-सामने, फाइलों के अधिकार को लेकर तीखी बहस

सिंगरौली। नगर निगम की परिषद बैठक में शुक्रवार को महापौर और कमिश्नर के बीच लंबे समय से चल रहा विवाद खुलकर सामने आ गया। एजेंडा बिंदुओं पर चर्चा के दौरान अधिकारों और फाइलों के निस्तारण को लेकर दोनों पक्षों में तीखी नोकझोंक हुई, जिससे सदन का माहौल गरमा गया।

बैठक में कमिश्नर सविता प्रधान ने आरोप लगाया कि निर्णय प्रक्रिया में स्पष्टता और समयबद्धता नहीं होने के कारण फाइलें लंबित रहती हैं। उन्होंने कहा कि कई बार फाइलें निगम कार्यालय से बाहर चली जाती हैं, जिससे प्रशासनिक कामकाज प्रभावित होता है। उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण मिला है तो उन्हें निर्णय लेने की जिम्मेदारी भी निभानी चाहिए। सदन में मौजूद महिला पार्षदों से उन्होंने अपने अधिकारों का सही तरीके से उपयोग करने की अपील की। साथ ही “पार्षद पति” या “महापौर पति” जैसे शब्दों पर आपत्ति जताते हुए इसे महिलाओं की गरिमा के खिलाफ बताया।

कमिश्नर के बयान के दौरान महापौर रानी अग्रवाल ने अपनी सीट से खड़े होकर जवाब दिया। उन्होंने कहा कि नियमों के अनुसार उन्हें फाइलें तीन दिन तक अपने पास रखने का अधिकार है और बिना पढ़े-समझे किसी भी फाइल पर हस्ताक्षर करना संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि किसी फाइल में भ्रष्टाचार की आशंका होती है तो उसे रोकना उनकी जिम्मेदारी है। महापौर ने यह भी कहा कि अधिकारियों द्वारा भी फाइलें अपने साथ ले जाई जाती हैं, ऐसे में केवल महापौर पर सवाल उठाना उचित नहीं है।
दोनों पक्षों के बीच बढ़ती बहस के बीच नगर निगम अध्यक्ष देवेश पांडे ने हस्तक्षेप कर सदन को मूल मुद्दे पर लौटने की अपील की। उनकी समझाइश के बाद स्थिति कुछ देर में शांत हुई और बैठक आगे बढ़ी।

अध्यक्ष देवेश पांडे ने कहा कि नियमों के अनुसार महापौर को सीमित समय तक फाइल रखने का अधिकार है, लेकिन यदि फाइलें महीनों तक लंबित रहती हैं तो इसका सीधा असर शहर के विकास कार्यों पर पड़ता है। उन्होंने बताया कि परिषद की बैठक 11 महीने बाद आयोजित हुई है और निर्णयों में देरी से विकास कार्य प्रभावित हो रहे हैं।
बैठक की यह नोकझोंक अब सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गई है और शहर की राजनीति में इसे लेकर सरगर्मी बढ़ गई है।

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