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बिहार वोटर लिस्ट मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, चुनाव आयोग को SIR कराने का अधिकार बरकरार

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को बिहार में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज करते हुए चुनाव आयोग की शक्तियों को बरकरार रखा। अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि चुनाव आयोग को मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए इस प्रकार की प्रक्रिया चलाने का पूरा संवैधानिक अधिकार है।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव केवल मतदान प्रक्रिया तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनकी नींव सही और विश्वसनीय वोटर लिस्ट पर टिकी होती है। कोर्ट ने माना कि बिहार में कराए गए विशेष गहन पुनरीक्षण से जनप्रतिनिधित्व अधिनियम का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।

अदालत ने कहा कि पिछले चार दशकों में बड़े पैमाने पर नाम जुड़ने और हटने, शहरीकरण, पलायन और मतदाता सूची में संभावित गड़बड़ियों को देखते हुए आयोग का यह कदम उचित था। कोर्ट ने चुनाव आयोग के इस तर्क को भी स्वीकार किया कि आधार कार्ड और वोटर आईडी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माने जा सकते।

इस मामले में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) सहित कई याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया था कि यह प्रक्रिया एनआरसी जैसी है और चुनाव आयोग नागरिकता जांच का काम कर रहा है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया के बाद लगभग 65 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से हटाए थे, जिनमें मृत, प्रवासी या अन्य निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत मतदाता शामिल बताए गए थे।

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