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15 साल से अलग रह रहे दंपती को मिला तलाक, सुप्रीम कोर्ट ने कहा- लंबे अलगाव को माना जा सकता है मानसिक क्रूरता

 

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू मैरिज एक्ट के तहत तलाक से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि पति-पत्नी लंबे समय तक एक-दूसरे से अलग रह रहे हों और रिश्ते को सुधारने की कोई वास्तविक कोशिश न की गई हो, तो इसे मानसिक क्रूरता माना जा सकता है। अदालत ने इस आधार पर 15 वर्षों से अलग रह रहे एक दंपती के तलाक को मंजूरी दे दी।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि जब वैवाहिक संबंध वास्तविक रूप से समाप्त हो चुके हों और उनके पुनर्जीवित होने की कोई संभावना न बची हो, तब विवाह को केवल कानूनी औपचारिकता के रूप में बनाए रखना उचित नहीं है।

यह मामला दो सरकारी डॉक्टरों से संबंधित है, जिनका विवाह 5 दिसंबर 2007 को गुजरात के नडियाद-खेड़ा में हुआ था। विवाह के कुछ ही महीनों बाद दोनों के बीच मतभेद बढ़ गए और वे अलग रहने लगे। वर्ष 2009 में पति ने राजस्थान के भरतपुर स्थित फैमिली कोर्ट में मानसिक क्रूरता के आधार पर तलाक की याचिका दायर की थी। फैमिली कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी, लेकिन जनवरी 2025 में राजस्थान हाईकोर्ट ने पति के पक्ष में फैसला सुनाते हुए तलाक मंजूर कर लिया। इसके बाद पत्नी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी।

मामले की सुनवाई कर रही पीठ में संजय करोल और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह शामिल थे। अदालत ने कहा कि बिना किसी ठोस कारण या शारीरिक अक्षमता के लंबे समय तक वैवाहिक संबंधों से दूरी बनाए रखना मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आ सकता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि विवाह केवल कानूनी बंधन नहीं, बल्कि भावनात्मक सहयोग, विश्वास और साझा जिम्मेदारियों का संबंध है।

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि पत्नी ने विवाह को बनाए रखने की इच्छा तो जताई, लेकिन पति के साथ रहने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किया। वहीं, सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर मई 2025 में कराई गई मध्यस्थता भी असफल रही।

अदालत ने दोनों पक्षों के 15 वर्षों के अलगाव, अलग-अलग पेशेवर जीवन और रिश्ते के पूरी तरह टूट जाने को देखते हुए संविधान के अनुच्छेद 142(1) के तहत अपने विशेष अधिकारों का उपयोग किया और विवाह समाप्त करने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि एक मृतप्राय और पूरी तरह टूट चुके रिश्ते को जबरन बनाए रखना केवल पीड़ा और निराशा को बढ़ाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि चूंकि दोनों पक्ष आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं और उनकी कोई संतान नहीं है, इसलिए तलाक का किसी तीसरे पक्ष पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके साथ ही अदालत ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

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