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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: सिर्फ अनुशासनहीनता या आदेश की अवहेलना पर नहीं किया जा सकता नौकरी से बर्खास्त

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के अधिकारों और सेवा नियमों से जुड़े एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि केवल अनुशासनहीनता, आदेशों की अवहेलना या वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का पालन न करने के आधार पर किसी कर्मचारी को नौकरी से बर्खास्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि बर्खास्तगी जैसी चरम सजा सिर्फ उन गंभीर मामलों के लिए सुरक्षित रखी जानी चाहिए जहां भ्रष्टाचार, नैतिक पतन, वित्तीय गड़बड़ी, फंड का दुरुपयोग या नियोक्ता को भारी नुकसान पहुंचाना साबित हो।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने कहा कि कार्यस्थल पर अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है, लेकिन हर मामले में सेवा से हटाना न्यायसंगत नहीं है। दंड का निर्धारण हमेशा कर्मचारी के कृत्य की गंभीरता, उसके पूर्व सेवा रिकॉर्ड और परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

महाराष्ट्र बिजली कंपनी के मामले में आया फैसला:
यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड (एमएसईडीसीएल) की एक महिला कर्मचारी से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। उक्त कर्मचारी को कथित अनुशासनहीनता और सरकारी दस्तावेज नष्ट करने के आरोप में बर्खास्त किया गया था। पीठ ने कर्मचारी की 21 वर्षों की सेवा को देखते हुए अधिकारियों को सजा पर पुनर्विचार करने और अनुपातिक दंड के सिद्धांत को अपनाने का निर्देश दिया।

पारिवारिक आर्थिक सुरक्षा पर पड़ता है असर, बरतें सावधानी
अदालत ने रेखांकित किया कि नौकरी से बर्खास्तगी सिर्फ सेवा समाप्त नहीं करती, बल्कि कर्मचारी को पेंशन और अन्य वैधानिक सुविधाओं से भी वंचित कर देती है, जिसका सीधा असर उसके परिवार की आर्थिक सुरक्षा पर पड़ता है। इसके अलावा, बर्खास्तगी का दाग भविष्य में रोजगार के अवसरों को भी हमेशा के लिए प्रभावित कर सकता है। इसलिए, यदि आचरण गंभीर भ्रष्टाचार या वित्तीय गड़बड़ी जैसा नहीं है, तो अधिकारियों को कम कठोर दंड पर विचार करना चाहिए।

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