पासपोर्ट नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं, यह वर्षों पुरानी कानूनी स्थिति है: विदेश मंत्रालय

नई दिल्ली। विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को स्पष्ट किया है कि भारतीय पासपोर्ट को कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं माना गया है। मंत्रालय ने साफ किया कि यह कोई नई नीति या मौजूदा सरकार का फैसला नहीं है, बल्कि पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के लागू होने के समय से ही देश में यही कानूनी स्थिति बनी हुई है।
विवाद की शुरुआत और विपक्ष के सवाल
यह मुद्दा तब गरमाया जब बुधवार को ‘पासपोर्ट सेवा दिवस’ के एक कार्यक्रम में विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी ने टिप्पणी की कि पासपोर्ट को मुख्य रूप से एक यात्रा दस्तावेज (Travel Document) के रूप में देखा जाना चाहिए। इस बयान के बाद कपिल सिब्बल और गीतकार जावेद अख्तर सहित कई विपक्षी नेताओं और टिप्पणीकारों ने सवाल उठाया कि जब कड़ी जांच-पड़ताल के बाद पासपोर्ट जारी होता है, तो आम नागरिक किस दस्तावेज पर भरोसा करें?
विदेश मंत्रालय का जवाब और प्रमुख तर्क
विवाद बढ़ता देख मंत्रालय ने अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए निम्न बातें बताईं:
गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट: पासपोर्ट अधिनियम की धारा 20 के तहत, केंद्र सरकार विशेष परिस्थितियों और सार्वजनिक हित में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट या यात्रा दस्तावेज जारी कर सकती है।
नागरिकता का निर्धारण: किसी व्यक्ति की नागरिकता का अंतिम फैसला केवल ‘नागरिकता अधिनियम, 1955’ के प्रावधानों के अनुसार ही होता है।
पहचान बनाम नागरिकता का प्रमाण: सुप्रीम कोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट (2013 का फैसला) भी अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट कर चुके हैं कि पासपोर्ट, आधार कार्ड या जन्म प्रमाणपत्र पहचान स्थापित करने के महत्वपूर्ण साक्ष्य जरूर हैं, लेकिन ये नागरिकता के निर्विवाद प्रमाण नहीं हैं।
सरकार ने यह साफ किया है कि यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर कभी कोई विवाद उत्पन्न होता है, तो उसे पारिवारिक रिकॉर्ड, जन्म प्रमाणपत्र, वंश संबंधी या प्राकृतिककरण दस्तावेजों के आधार पर अपनी नागरिकता साबित करनी होगी। केवल पासपोर्ट का होना इस बात की अंतिम गारंटी नहीं है कि संबंधित व्यक्ति भारतीय नागरिक ही है।












