डिजिटल दौर में बुजुर्गों का बढ़ता अकेलापन, मोबाइल ने घटाई दूरियां तो बढ़ाई निर्भरता और असुरक्षा

भोपाल। मोबाइल फोन और इंटरनेट ने जिंदगी को आसान बनाने में बड़ी भूमिका निभाई है। बैंकिंग, खरीदारी, टिकट बुकिंग, अस्पताल की जानकारी, सरकारी सेवाएं और अपनों से बातचीत जैसे काम अब कुछ क्लिक में हो जाते हैं। लेकिन तकनीक की यही तेज रफ्तार समाज के बुजुर्ग वर्ग के लिए नई चुनौती भी बनती जा रही है। डिजिटल बदलाव ने सुविधाएं बढ़ाई हैं, मगर कई वरिष्ठ नागरिकों के लिए इसके साथ अकेलापन, निर्भरता और साइबर असुरक्षा भी बढ़ी है।
कुछ साल पहले तक बैंक जाना, दुकान से सामान खरीदना, सरकारी कार्यालय में जानकारी लेना या परिवार के साथ बैठकर बातचीत करना बुजुर्गों की दिनचर्या का हिस्सा था। अब इनमें से बड़ी संख्या में काम ऑनलाइन हो गए हैं। बैंकिंग एप, यूपीआई, ऑनलाइन अपॉइंटमेंट, मोबाइल टिकट और सरकारी पोर्टल ने व्यवस्था को तेज बनाया है, लेकिन जिन लोगों ने जीवन का अधिकांश हिस्सा इन तकनीकों के बिना गुजारा है, उनके लिए यह बदलाव हमेशा सहज नहीं है।
तकनीक से ज्यादा भरोसे की चुनौती
बुजुर्गों के सामने सबसे बड़ी परेशानी कई बार मोबाइल चलाने की नहीं, बल्कि डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा करने की होती है। बैंक के नाम से आया संदेश, अनजान लिंक, ओटीपी मांगने वाला फोन या किसी सेवा के नाम पर मांगी गई निजी जानकारी उन्हें असमंजस में डाल सकती है। साइबर ठगी की बढ़ती घटनाओं ने इस डर को और गहरा किया है।
कई वरिष्ठ नागरिक डिजिटल भुगतान और इंटरनेट बैंकिंग का इस्तेमाल करने से इसलिए बचते हैं क्योंकि उन्हें यह स्पष्ट नहीं होता कि कौन-सी जानकारी साझा करना सुरक्षित है और कौन-सी नहीं। परिणाम यह होता है कि सामान्य डिजिटल कामों के लिए भी उन्हें परिवार के किसी सदस्य की मदद लेनी पड़ती है।
संयुक्त परिवार घटे, डिजिटल निर्भरता बढ़ी
बुजुर्गों के अकेलेपन की समस्या केवल तकनीक से जुड़ी नहीं है। संयुक्त परिवारों का कम होना और रोजगार के लिए युवाओं का दूसरे शहरों में चले जाना भी इसका बड़ा कारण है। कई वरिष्ठ नागरिक अब अकेले रहते हैं। ऐसे में मोबाइल या इंटरनेट से जुड़ी छोटी-सी समस्या भी उनके लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।
मोबाइल ने परिवार से संपर्क जरूर आसान किया है, लेकिन वीडियो कॉल हमेशा आमने-सामने बैठकर बातचीत का विकल्प नहीं बन सकती। बच्चों और पोते-पोतियों से रोज मोबाइल पर बात करने के बावजूद कई बुजुर्गों को रोजमर्रा की जिंदगी में साथ की कमी महसूस होती है। यही डिजिटल सुविधा और वास्तविक सामाजिक जुड़ाव के बीच का अंतर है।
बुजुर्गों को तकनीक से दूर नहीं, सुरक्षित तरीके से जोड़ना जरूरी
विशेषज्ञों की दृष्टि से समाधान बुजुर्गों को डिजिटल दुनिया से दूर रखना नहीं, बल्कि उन्हें सरल और सुरक्षित तरीके से डिजिटल रूप से सक्षम बनाना है। उन्हें केवल कॉल या वीडियो कॉल चलाना सिखाना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल भुगतान, पासवर्ड की सुरक्षा, ओटीपी की गोपनीयता, संदिग्ध लिंक की पहचान और साइबर ठगी से बचाव की जानकारी भी देना जरूरी है।
परिवार इस बदलाव में सबसे अहम भूमिका निभा सकता है। युवा सदस्यों को बुजुर्गों की डिजिटल गलतियों पर नाराज होने के बजाय धैर्यपूर्वक उन्हें समझाना चाहिए। जिस तकनीक को युवा कुछ सेकंड में समझ लेते हैं, उसे सीखने में बुजुर्गों को कई दिन या कई बार उससे भी ज्यादा समय लग सकता है।
हर सेवा पूरी तरह डिजिटल होना भी समाधान नहीं
डिजिटल व्यवस्था जरूरी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होना चाहिए कि हर सेवा पूरी तरह ऑनलाइन कर दी जाए और तकनीक से अनजान व्यक्ति के लिए कोई विकल्प न बचे। बैंक, अस्पताल, सरकारी कार्यालय और सार्वजनिक सेवाओं में सहायता डेस्क, हेल्पलाइन और व्यक्तिगत मार्गदर्शन जैसी व्यवस्थाएं भी बनी रहनी चाहिए।
डिजिटल भुगतान इसका उदाहरण है। युवाओं के लिए यूपीआई और अन्य डिजिटल माध्यम बेहद सुविधाजनक हैं, लेकिन हर बुजुर्ग इसके इस्तेमाल में सहज नहीं होता। वर्षों से नकद भुगतान की आदत वाले व्यक्ति के लिए अचानक पूरी व्यवस्था डिजिटल हो जाना परेशानी पैदा कर सकता है। इसलिए तकनीकी विकास के साथ व्यवस्था का समावेशी होना भी जरूरी है।
सामुदायिक स्तर पर भी हो पहल
बुजुर्गों के डिजिटल अकेलेपन को कम करने के लिए स्थानीय संस्थाएं, सामाजिक संगठन, सामुदायिक केंद्र और आवासीय समितियां डिजिटल प्रशिक्षण शिविर आयोजित कर सकती हैं। इन शिविरों में सरल भाषा में मोबाइल बैंकिंग, डिजिटल भुगतान और साइबर सुरक्षा की जानकारी दी जाए। साथ ही ऐसे कार्यक्रमों को केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न रखकर बुजुर्गों को एक-दूसरे से मिलने और बातचीत करने का अवसर भी दिया जाना चाहिए।
डिजिटल साक्षरता के साथ डिजिटल आत्मनिर्भरता बढ़ाना भी जरूरी है। बुजुर्गों को हर छोटे काम के लिए बच्चों या पड़ोसियों पर निर्भर न रहना पड़े, इसके लिए उनकी जरूरत के मुताबिक तकनीक का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। दूसरी ओर, उनसे हर काम खुद करने की अपेक्षा भी उचित नहीं है। जरूरत पड़ने पर सहायता उपलब्ध रहना उतना ही जरूरी है।
युवाओं की जिम्मेदारी भी कम नहीं
परिवार के युवा सदस्य यदि नियमित रूप से कुछ समय निकालकर माता-पिता या दादा-दादी को मोबाइल की नई सुविधाएं समझाएं, फोन की सुरक्षा जांचें और संदिग्ध संदेशों की पहचान करना सिखाएं तो कई परेशानियां कम की जा सकती हैं। लेकिन इसके साथ व्यक्तिगत मुलाकात भी जरूरी है। केवल मोबाइल पर हालचाल पूछ लेना बुजुर्गों के सामाजिक अकेलेपन को पूरी तरह दूर नहीं कर सकता।
असल चुनौती तकनीक की रफ्तार को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि इस रफ्तार में कोई पीछे न छूटे। डिजिटल भारत तभी मजबूत होगा, जब उम्र, शिक्षा या तकनीकी दक्षता के आधार पर किसी नागरिक को असहाय महसूस न करना पड़े।
मोबाइल और इंटरनेट ने भौतिक दूरियां जरूर कम की हैं, लेकिन अब समाज के सामने चुनौती है कि तकनीकी सुविधा के बीच मानवीय दूरी न बढ़े। बुजुर्गों को सिर्फ स्मार्टफोन चलाना सिखाना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भरोसा देना भी जरूरी है कि दुनिया भले डिजिटल हो रही है, लेकिन परिवार और समाज में उनकी भूमिका, सम्मान और जरूरत आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यही संतुलन तकनीकी विकास को वास्तविक सामाजिक प्रगति में बदल सकता है।













