जमीन मालिक की सहमति के बिना भी बिछाई जा सकेगी बिजली ट्रांसमिशन लाइन, मुआवजे का अधिकार रहेगा बरकरार: मप्र हाई कोर्ट

जबलपुर। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने बिजली ट्रांसमिशन लाइन बिछाने को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी बिजली लाइसेंसी को विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 164 के तहत भारतीय तार अधिनियम, 1885 की शक्तियां प्राप्त हैं, तो निजी जमीन पर ट्रांसमिशन लाइन ले जाने या टावर लगाने के लिए जमीन मालिक की पूर्व सहमति लेना अनिवार्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इससे प्रभावित भूमि स्वामियों का उचित मुआवजा पाने का विधिक अधिकार समाप्त नहीं होता।
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया और न्यायमूर्ति प्रदीप मित्तल की खंडपीठ ने रायसेन जिले के मंडीदीप क्षेत्र (ग्राम सिमरई) में 132 केवी डीसीएसएस मंडीदीप नहर ट्रांसमिशन लाइन की दूसरी सर्किट स्ट्रिंगिंग से जुड़ी दो रिट याचिकाओं को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। यह लाइन नाहर पॉली फिल्म्स लिमिटेड की नई औद्योगिक इकाई को विद्युत आपूर्ति के लिए प्रस्तावित थी, जिसके अलाइनमेंट और टावर नंबर 7 व 8 के स्थान को दौलत राम इंजीनियरिंग सर्विसेज और नासा कॉरपोरेशन ने अदालत में चुनौती दी थी।
तकनीकी टीम का फैसला सर्वोपरि, गैस पाइपलाइन सुरक्षा से समझौता नहीं
याचिकाकर्ताओं द्वारा सुझाए गए वैकल्पिक मार्ग को खारिज करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि लाइन के अलाइनमेंट का निर्धारण तकनीकी विशेषज्ञों का कार्य है। विशेषज्ञ टीम के निरीक्षण में सामने आया था कि वैकल्पिक मार्ग से टावर मौजूदा गैस पाइपलाइन से महज 3.5 मीटर की दूरी पर आता, जो केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (सीईए) के 2023 के सुरक्षा मानकों के खिलाफ था। कोर्ट ने माना कि सुरक्षा मानकों की अनदेखी कर केवल जमीन मालिक की सुविधा के आधार पर तकनीकी निर्णयों में हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता।
मुआवजे का रास्ता हमेशा खुला
पीठ ने स्पष्ट किया कि भारतीय तार अधिनियम की धारा 10(डी) और धारा 16(3) के अंतर्गत प्रभावित जमीन मालिक अपनी संपत्ति को हुए नुकसान के एवज में मुआवजे का दावा करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं। इसके अतिरिक्त, किसी निजी औद्योगिक उपभोक्ता को बिजली देने के आधार पर लाइसेंसी के वैधानिक अधिकारों को नकारा नहीं जा सकता।
देरी से याचिका दायर करने और आवश्यक तथ्यों को छिपाने पर अदालत ने याचिकाकर्ताओं के आचरण पर टिप्पणी करते हुए दोनों याचिकाओं को खारिज कर दिया। साथ ही दोनों याचिकाकर्ताओं पर एक-एक लाख रुपये (कुल ₹2 लाख) का हर्जाना लगाते हुए इसे नाहर पॉली फिल्म्स को अदा करने का आदेश दिया।













