एनसीबीआर के आंकडे कर रहे पुष्टि रेलवे भर्ती संकट: मौतों और बेरोज़गारी की बढ़ती चुनौती

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भारतीय रेलवे न केवल एशिया का सबसे बड़ा नियोक्ता है बल्कि करोड़ों युवाओं के लिए रोज़गार का प्रमुख स्रोत भी है। हर साल लाखों युवा इसकी नौकरी पाने का सपना देखते हैं, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में रेलवे भर्ती प्रक्रिया में लेट-लतीफी ने युवाओं के विश्वास को झकझोर कर रख दिया है और वहीं दूसरी तरफ मौतों की संख्या बढ़ा दी है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीबीआर) के आंकड़े इस गंभीर स्थिति की पुष्टि करते नजर आ रहे हैं।
रेलवे में नौकरी पाने के लिए हर साल ग्रुप-डी से लेकर तकनीकी और क्लर्क पोस्ट तक हज़ारों–लाखों आवेदन युवा करते हैं। हालांकि, कई बार विज्ञापन निकलने के बावजूद परीक्षाएं स्थगित कर दी जाती हैं या रिज़ल्ट समय पर जारी नहीं होते हैं।
कभी-कभी नियुक्ति पत्र मिलने में सालों लग जाते हैं। इस लगातार लंबित प्रक्रिया ने बेरोज़गार युवाओं को निराशा की गहरी खाई में धकेलने का काम किया है। एनसीबीआर के आंकड़ों से पता चलता है कि रेलवे से जुड़ी मौतों में लगातार इज़ाफ़ा हुआ है। इनमें आत्महत्या, दुर्घटनाएं और असुरक्षित कार्य परिस्थितियों में होने वाली मौतें शामिल हैं। विशेषकर युवाओं का बड़ा हिस्सा उन उम्मीदों के टूटने की वजह से ट्रैक या अन्य स्थानों पर अपनी जान गंवा रहा है।
कई राज्यों में युवाओं ने स्पष्ट रूप से लिखा है, कि रेलवे भर्ती न होने के कारण जीवन बेकार हो गया। आरोप है कि सरकार की संवेदनहीनता इस संकट को और गंभीर बना रही है। बार-बार स्थगित परीक्षाओं और अधूरी भर्ती प्रक्रिया ने युवा आंदोलनों और धरनों को जन्म दिया। 2022 में देशभर में आरआरबीएग्जाम और रेलवे रिक्वायरमेंट जैसे हैशटैग के माध्यम से लाखों उम्मीदवारों ने अपनी नाराज़गी जताई। कई जगह पुलिस कार्रवाई भी हुई, लेकिन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकला।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे भर्ती प्रक्रिया को तुरंत पारदर्शी और समयबद्ध बनाना होगा। इसके साथ ही बेरोज़गार युवाओं के लिए वैकल्पिक रोज़गार, स्किल डेवलपमेंट और कैरियर गाइडेंस प्रोग्राम को मज़बूत किया जाना आवश्यक है। युवाओं के प्रति सरकार का संवेदनशील रवैया ही इस संकट का स्थायी समाधान साबित हो सकता है। रेलवे भर्ती केवल नौकरी का अवसर नहीं है, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों की डोर है।
जब यह डोर टूटती है तो न केवल परिवार बिखरते हैं बल्कि देश का भविष्य भी संकट में पड़ता है। एनसीबीआर के आंकड़े चेतावनी हैं कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो बेरोज़गारी और आत्महत्याओं का यह सिलसिला और तेज़ हो जाएगा।













