देश विदेशबड़ी खबरब्रेकिंग न्यूज़

कर्नाटक हाईकोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने वाले कानून के प्रावधान किए रद्द, 50 प्रतिशत सीमा पर फिर बहस तेज

दाखिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाने के प्रावधानों को असंवैधानिक ठहराने का दावा, फैसले के बाद कानूनी विकल्पों पर नजर

बेंगलुरु। कर्नाटक में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के आरक्षण में बढ़ोतरी से जुड़े कानून को लेकर हाईकोर्ट के फैसले ने आरक्षण व्यवस्था पर नई बहस छेड़ दी है। पलपल रिपोर्टर की 13 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, अदालत ने वर्ष 2022 के कानून की धारा 3 और धारा 4 को निरस्त कर दिया। इन प्रावधानों के जरिए शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में एससी-एसटी आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान किया गया था।

रिपोर्ट के मुताबिक, मुख्य न्यायाधीश विभु बाखरू और न्यायमूर्ति के. एस. हेमलेखा की खंडपीठ ने कहा कि आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत से अधिक करने के लिए संवैधानिक आधार और निर्धारित कानूनी कसौटियों का पालन जरूरी है। इस फैसले से राज्य में आरक्षण का कुल दायरा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 56 प्रतिशत करने के कदम पर सवाल खड़े हुए हैं।

अनुच्छेद 14, 15 और 16 के उल्लंघन का सवाल

रिपोर्ट में बताया गया है कि हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में दाखिले से संबंधित धारा 3 को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के संदर्भ में असंवैधानिक माना। वहीं, सरकारी सेवाओं और नौकरियों में आरक्षण से संबंधित धारा 4 को अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप नहीं पाया गया।

संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और समान संरक्षण की गारंटी देता है। अनुच्छेद 15 कुछ आधारों पर भेदभाव को प्रतिबंधित करता है और विशेष प्रावधानों की अनुमति भी देता है। अनुच्छेद 16 सरकारी रोजगार में अवसरों की समानता से संबंधित है तथा निर्धारित परिस्थितियों में आरक्षण की व्यवस्था का आधार प्रदान करता है।

आरक्षण से संबंधित विवादों में अदालतों को समानता के संवैधानिक सिद्धांतों, सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन तथा आरक्षण के औचित्य के बीच संतुलन पर विचार करना होता है। इस मामले में फैसले के विस्तृत तर्क और आधिकारिक आदेश का अध्ययन महत्वपूर्ण होगा।

इंदिरा साहनी फैसले का संदर्भ

आरक्षण की सीमा पर चर्चा में सुप्रीम कोर्ट का वर्ष 1992 का इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार फैसला महत्वपूर्ण माना जाता है। इस फैसले में सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा का सिद्धांत स्थापित किया गया था। हालांकि, आरक्षण से जुड़े संवैधानिक प्रश्नों में संबंधित कानून, उसके आधार और लागू न्यायिक नजीरों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक होता है।

रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने एससी आरक्षण को 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी आरक्षण को 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करने का कदम उठाया था। इससे राज्य में इन दोनों वर्गों का कुल आरक्षण 18 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया था। इस बदलाव के चलते कुल आरक्षण का आंकड़ा 50 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत पहुंचा।

इस व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिकाओं में आरक्षण की निर्धारित सीमा और संवैधानिक प्रावधानों का हवाला दिया गया था। हाईकोर्ट के कथित फैसले ने इसी कानूनी विवाद को फिर केंद्र में ला दिया है।

सामाजिक न्याय और राजनीतिक जवाबदेही पर बहस

रिपोर्ट के मुताबिक, कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री जी. परमेश्वर ने फैसले को गंभीर और संवेदनशील मामला बताया। उन्होंने कहा कि एससी-एसटी आरक्षण में बढ़ोतरी से संबंधित प्रावधान निरस्त होने का सामाजिक न्याय, शिक्षा में अवसरों और सरकारी नौकरियों पर असर पड़ सकता है।

उन्होंने पूर्ववर्ती भाजपा सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए। राज्य सरकार की ओर से न्यायपालिका और संविधान के प्रति सम्मान जताते हुए आगे के कानूनी विकल्पों पर विचार करने की बात कही गई है। रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट में अपील की संभावना का भी उल्लेख है।

आरक्षण का विषय सामाजिक प्रतिनिधित्व और समान अवसरों से जुड़ा है। इसलिए ऐसे फैसलों का असर केवल सरकारी आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शिक्षा और रोजगार की तैयारी कर रहे युवाओं की उम्मीदों तथा संबंधित वर्गों के प्रतिनिधित्व पर भी चर्चा को जन्म देता है।

आगे क्या होगा?

हाईकोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार के अगले कदम महत्वपूर्ण होंगे। यदि सरकार अपील करती है, तो सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान कानून की संवैधानिक वैधता, आरक्षण की सीमा और संबंधित तथ्यों पर आगे विचार हो सकता है। अंतिम स्थिति अदालत के आदेशों और आगे की न्यायिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगी।

Author

Related Articles

Back to top button