ननि अध्यक्ष पर अविश्वास की साजिश ध्वस्त
नौ पार्षदों ने शपथ पत्र देकर प्रस्ताव लिया वापस, हाईकोर्ट से भी रोक

सिंगरौली-नगर पालिका निगम सिंगरौली के अध्यक्ष देवेश पाण्डेय के खिलाफ लाया गया अविश्वास प्रस्ताव एक बड़े राजनीतिक उलटफेर के साथ धराशायी हो गया है। अविश्वास प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करने वाले नौ पार्षदों ने कलेक्टर कार्यालय में शपथ पत्र देकर अपना समर्थन वापस ले लिया, जिससे पूरा घटनाक्रम पलट गया। इस घटनाक्रम को कांग्रेस पार्षद अनिल कुमार बैस और कथित तौर पर पर्दे के पीछे सक्रिय महापौर रानी अग्रवाल के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
गौरतलब है कि अक्टूबर 2025 से कांग्रेस, बसपा और आम आदमी पार्टी के पार्षद मिलकर ननि अध्यक्ष देवेश पाण्डेय के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कवायद कर रहे थे। तत्कालीन कलेक्टर चन्द्रशेखर शुक्ला के समक्ष दो बार प्रस्ताव सौंपा गया। उनके स्थानांतरण के बाद वर्तमान कलेक्टर गौरव बैनल से भी प्रस्ताव की बैठक बुलाने की मांग की जा रही थी।
इसी बीच कांग्रेस पार्षद अनिल कुमार बैस ने उच्च न्यायालय जबलपुर में याचिका दायर की, जिस पर खंडपीठ ने कलेक्टर को 30 दिवस में बैठक बुलाने के निर्देश दिए थे। यह आदेश 11 दिसंबर 2025 को पारित हुआ था। इसके खिलाफ अध्यक्ष देवेश पाण्डेय की ओर से भी उच्च न्यायालय में याचिका दायर की गई, जिस पर न्यायालय ने 11 दिसंबर के आदेश पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। प्रकरण को चार सप्ताह बाद सूचीबद्ध किया जाएगा और इस दौरान राज्य शासन से जवाब तलब किया गया है।
इस बीच नौ पार्षदों द्वारा अविश्वास प्रस्ताव वापस लेने के लिए दिए गए हलफनामों से सिंगरौली की राजनीति में जबरदस्त हलचल मच गई है। राजनीतिक हलकों में इसे महापौर रानी अग्रवाल के लिए भी बड़ा झटका माना जा रहा है। चर्चाएं हैं कि उन्होंने ही पार्षद अनिल कुमार बैस को आगे कर अध्यक्ष को घेरने की रणनीति बनाई थी, लेकिन भाजपा के रणनीतिक प्रबंधन के चलते यह प्रयास विफल हो गया।
पार्षद अनिल बैस और महापौर को करारा झटका
राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो नगर निगम में भाजपा के 45 में से 23 पार्षद हैं, इसके बावजूद कांग्रेस, बसपा और अन्य दलों के सहारे अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश की गई। सूत्रों के अनुसार यह पूरी कवायद अध्यक्ष पर दबाव बनाने की रणनीति थी, लेकिन यह दांव उल्टा पड़ गया।
नौ पार्षदों के अचानक समर्थन वापस लेने से अनिल कुमार बैस और महापौर रानी अग्रवाल दोनों को राजनीतिक रूप से बड़ा झटका लगा है। चर्चाएं हैं कि आने वाले दिनों में महापौर की मुश्किलें बढ़ सकती हैं और भाजपा अब इस मामले में और आक्रामक रुख अपना सकती है।













