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वन बल प्रमुख की नियुक्ति पर बढ़ी हलचल: सीनियरिटी बनाम मेरिट पर बहस तेज

भोपाल। मध्यप्रदेश में वन बल प्रमुख की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक हलकों में गहमागहमी तेज हो गई है। 1990 बैच के वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार कर 1991 बैच के अधिकारी अजय कुमार सेन को विभाग की कमान सौंपे जाने के फैसले ने चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और वरिष्ठता पर बहस छेड़ दी है।

सीनियर अधिकारियों की अनदेखी पर सवाल

वन बल प्रमुख की दौड़ में 1990 बैच के विभाष ठाकुर और एच.यू. खान प्रमुख दावेदार माने जा रहे थे। दोनों अधिकारियों की छवि नियमों के कड़ाई से पालन करने वाले और अनुशासनप्रिय अफसरों की रही है। विभागीय सूत्रों के अनुसार वरिष्ठता क्रम के आधार पर इन्हीं में से किसी एक को जिम्मेदारी मिलने की संभावना जताई जा रही थी।

ऐसे में जूनियर अधिकारी को शीर्ष पद सौंपे जाने के बाद चयन के मानदंडों को लेकर सवाल उठने लगे हैं। सरकार की ओर से प्रशासनिक दक्षता, उपलब्धियों और नेतृत्व क्षमता को प्राथमिकता दिए जाने की दलील दी जा रही है, लेकिन विश्लेषकों का कहना है कि यदि मेरिट के आधार पर निर्णय हुआ है तो मूल्यांकन के स्पष्ट आधार सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

वरिष्ठता बनाम प्रदर्शन की बहस

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सेवा ढांचे में वरिष्ठता केवल वर्षों का आंकड़ा नहीं, बल्कि अनुभव और संस्थागत निरंतरता का प्रतीक होती है। यदि वरिष्ठता क्रम को दरकिनार किया जाता है, तो इससे अधिकारियों के मनोबल पर असर पड़ सकता है।

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, शीर्ष पदों पर नियुक्ति में सरकार को परिणाम देने वाले अधिकारी और निष्पक्ष प्रक्रिया—दोनों के बीच संतुलन साधना होता है। यदि चयन के कारण स्पष्ट नहीं किए गए, तो विपक्ष इसे मुद्दा बना सकता है।

संभावित प्रशासनिक फेरबदल

नियुक्ति के बाद विभाग में व्यापक फेरबदल की चर्चाएं भी तेज हैं। सूत्रों के मुताबिक विभाष ठाकुर को वन मुख्यालय से हटाकर लघु वनोपज संघ या वन विकास निगम में भेजा जा सकता है।

लघु वनोपज संघ की एमडी समिता राजौरा की भूमिका में भी बदलाव संभव है। वहीं 1990 बैच की आईएफएस अधिकारी रेनू सिंह 1 मार्च को प्रतिनियुक्ति से लौट रही हैं। उनकी वापसी से वन विकास निगम में पदस्थापना और पदोन्नति के समीकरण प्रभावित हो सकते हैं।

पृष्ठभूमि में पुराने मतभेद

सूत्रों के अनुसार, पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल के साथ कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के मतभेद भी चर्चा में हैं। नर्मदापुरम में अवैध कटाई और अन्य वित्तीय मामलों में सख्त रुख अपनाने के कारण कुछ फैसले विवादों में रहे थे।

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