लखनऊ के इस शख्स का इसमें काफी बड़ा योगदान 77 साल बाद मिजोरम पहुंच रही भारतीय रेल

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प्राकृतिक संपदाओं से घिरा पूर्वोत्तर का खूबसूरत राज्य मिजोरम 13 सितंबर से भारतीय मानचित्र में रेल नेटवर्क से जुड़ेगा। इसके साथ लखनऊ ही नहीं उत्तर प्रदेश के पर्यटकों के लिए त्रिपुरा, असम और मणिपुर से घिरे हुए मिजोरम की राजधानी आइजोल में छुट्टी बिताने की राह आसान होगी।
विमान के महंगे सफर की जगह कानपुर से सिलचर होकर आइजोल ट्रेन से पहुंचा जा सकेगा। पुलवामा हमले के बाद इस बार गर्मी में लखनऊ और उत्तर प्रदेश से पूर्वोत्तर की ओर जाने वाले यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ी।
असम, अरुणाचल प्रदेश के बाद अब इन पर्यटकों के लिए मिजोरम एक नया विकल्प होगा। रेल नेटवर्क उत्तर प्रदेश के लिए नया कारोबारी केंद्र बनेगा। मिजोरम के बांस से बने पारंपरिक उत्पादों और परंपरागत जनजाति डिजाइन वाले विभिन्न प्रकार के वस्त्रों की पहुंच भी बहुत कम खर्च और तेजी से लखनऊ तक हो सकेगी।
स्वतंत्रता के 77 साल बाद आइजोल को रेल नेटवर्क से जोड़ने का सपना साकार करने में लखनऊ का योगदान भी अहम है। रेलवे के इतिहास में सबसे कठिन प्रोजेक्टों में से एक बैराबी से सायरंग तक कुल 51. 38 किलोमीटर लंबी रेललाइन तैयार करने में रेलवे अधिकारी पीके क्षत्रिय ने भी अहम भूमिका निभाई है।
वह जनवरी 2023 से जनवरी 2025 तक प्रोजेक्ट से रेलवे निर्माण संगठन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी के रूप में जुड़े रहे। भारतीय रेलवे इंजीनियरिंग सेवा के 1987 बैच के अधिकारी पीके क्षत्रिय अनुसंधान अभिकल्प व मानक संगठन (आरडीएसओ) के एडीजी के पद से रविवार को सेवानिवृत्त हो गए। बैराबी से आइजोल के सायरंग स्टेशन तक नई रेल लाइन बिछाने का प्रस्ताव वर्ष 1999 में तैयार हुआ था।
दुर्गम पहाड़ों, घने जंगलों और भारी बारिश से शुरुआती दिनों में सर्वे तक नहीं हुआ था। कई बार सर्वे रिपोर्ट को बदलना पड़ा और फिर इस वर्ष 2008–09 में नेशनल प्रोजेक्ट का दर्जा मिला।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 29 नवंबर 2014 को परियोजना का शिलान्यास। सायरंग में ही 114 मीटर ऊंचा रेलवे पुल नंबर 196 बनाया गया। इसकी ऊंचाई कुतुबमीनार से 42 मीटर अधिक है। क्षत्रिय बताते हैं कि सबसे बड़ी चुनौती यहां का खराब मौसम था।
अप्रैल से सितंबर तक साल के छह महीने बारिश होने से काम बंद रहता था। यह प्रोजेक्ट नेशनल हाइवे से 12 से 14 किलोमीटर दूर चल रहा था। इसकारण निर्माण स्थल पर उड़ीसा के गर्डर सहित सभी सामान पहुंचाने के लिए करीब 200 किमी. का रास्ता बनाना पड़ा।
हर बारिश और भूस्खलन के बाद यह रास्ता खराब हो जाता था इस रास्ते को फिर से ठीक करके ट्रांसपोर्ट के लिए तैयार किया जाता था। काम के लिए बाहरी राज्यों के श्रमिकों पर निर्भरता थी। मिजोरम का खानपान उनके अनुकूल नहीं था। मोबाइल फोन की कनेक्टिविटी नहीं होने से उनका अपने घरों से संपर्क कटा रहता था।
इसके बाद श्रमिकों को रोकना बहुत मुश्किल था। वह अपने पूरे ग्रुप के साथ काम छोड़कर चले जाते थे। सड़क की अपेक्षा ट्रेन रूट का अलाइनमेंट छोटा रखा गया। इस कारण टनल से निकलकर वादियों और वादियों से निकलकर टनल तक का काम चुनौती बढ़ा रहा था।
आम समझ सकते हैं कि आम रेल सेक्शन पर जहां रेलवे पुलों की ऊंचाई 10 से 15 मीटर होती है, वहीं इस सेक्शन पर पुल की औसत ऊंचाई 56 मीटर रखी गई।
यह मौसम है खास
आइजोल के पर्यटन से जुड़े कारोबारी बताते हैं कि यहां सितंबर से मार्च तक कई फेस्टिवल होते हैं। इसमें सबसे प्रमुख चापचर कुट मार्च में झूम कृषि के सबसे कठिन कार्य के पूरा होने के बाद मनाया जाता है।
फ्लावटर फेस्टिवल और क्रिसमस पर्व आइजोल विदेशी पर्यटक भी जुटते हैं। इसके बाद इस बार नई रेल लाइन शुरू होने से पर्यटकों की संख्या में वृद्धि हो सकती है। यह आइजोल तक रेल लाइन शुरू होने से गुवाहाटी रेफर होने वाले रोगियों को विमान टिकट के रुपयों की व्यवस्था करने में एक महीने तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा।













