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घर के भीतर जातिसूचक टिप्पणी SC/ST एक्ट के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट

 

नई दिल्ली। Supreme Court of India ने अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि जातिसूचक गाली-गलौज घर की चारदीवारी के भीतर हुई हो और वहां आम जनता की मौजूदगी या नजर न हो, तो इसे एससी-एसटी एक्ट के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया। मामला दो भाइयों के बीच विवाद से जुड़ा था, जो अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित हैं। आरोप था कि शिकायतकर्ता और उसकी पत्नी को “चूड़ा”, “चमार” और “हरिजन” जैसे जातिसूचक शब्द कहकर अपमानित किया गया।

निचली अदालत और Delhi High Court ने आरोप तय करने के आदेश दिए थे, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट की धारा 3(1)(आर) और 3(1)(एस) तभी लागू होती हैं, जब कथित अपमान “सार्वजनिक नजर” में हुआ हो।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी निजी घर को केवल इस आधार पर सार्वजनिक स्थान नहीं माना जा सकता कि वह पूरी तरह से बंद नहीं था। फैसले में कहा गया कि एफआईआर में यह उल्लेख नहीं था कि घटना के समय कोई बाहरी व्यक्ति मौजूद था या घटना को देख सकता था। ऐसे में मामले को आगे बढ़ाना कानून का दुरुपयोग माना जाएगा।

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