मंदिरों के प्रबंधन में मनमाना सरकारी हस्तक्षेप नहीं: हाई कोर्ट

जबलपुर: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ किया है कि सरकार किसी निजी मंदिर के प्रबंधन में मनमाने तरीके से दखल नहीं दे सकती। न्यायमूर्ति दीपक खटे (Deepak Khate) की एकलपीठ ने सिवनी जिले के एक प्राचीन शिव मंदिर से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया कि किसी भी मंदिर पर प्रबंधन योजना लागू करने से पहले यह तय करना अनिवार्य होगा कि वह मंदिर सार्वजनिक है या निजी।
अदालत ने राज्य सरकार और जिला प्रशासन को निर्देश दिए हैं कि बिना विधिसम्मत जांच के निजी मंदिरों के प्रबंधन में हस्तक्षेप कानून के खिलाफ माना जाएगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई मंदिर निजी संपत्ति या परिवार द्वारा स्थापित और संचालित है, तो सरकार को उसके प्रबंधन में दखल का अधिकार नहीं है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला सिवनी जिले के डूंडा सिवनी गांव के एक शिव मंदिर से जुड़ा है। मंदिर के सर्वराहकार सुमरन ने लोक न्यास रजिस्ट्रार द्वारा गठित पांच सदस्यीय समिति को हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता ने बताया कि उनका परिवार चार पीढ़ियों से मंदिर की देखरेख कर रहा है। वर्ष 1913 में स्वर्गीय भवानी पटेल ने यह मंदिर बनवाया था और रखरखाव के लिए 14 एकड़ जमीन दान दी थी। याचिका में आरोप लगाया गया कि कुछ लोगों की शिकायत पर रजिस्ट्रार ने बिना यह जांचे कि मंदिर निजी है या सार्वजनिक, प्रबंधन समिति बना दी, जिसमें दो सरकारी कर्मचारी भी शामिल हैं।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि मंदिर 200 साल पुराना है और शिकायतों व मरम्मत की आवश्यकता के चलते प्रशासनिक हस्तक्षेप जरूरी था। हालांकि, अदालत ने कहा कि सिर्फ प्राचीन होने या विवाद होने के आधार पर मंदिर स्वतः सार्वजनिक नहीं हो जाता।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला
हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ‘State of Madhya Pradesh vs Pujari Utthan Evam Kalyan Samiti’ का हवाला देते हुए कहा कि हिंदू कानून के तहत मंदिर में स्थापित देवता ही संपत्ति के वास्तविक स्वामी (विधिक इकाई) होते हैं। पुजारी केवल पूजा-अर्चना और देखरेख करते हैं। देवता की ओर से कोई भी श्रद्धालु “नेक्स्ट फ्रेंड” बनकर मुकदमा कर सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार सीधे प्रबंधन पर कब्जा कर ले।
कलेक्टर को निर्देश जारी करने के आदेश
अदालत ने कहा कि जिला कलेक्टर स्वतः सभी मंदिरों के प्रबंधक नहीं हो सकते। सरकार केवल उन्हीं मंदिरों पर नियंत्रण कर सकती है, जिन पर उसका विधिसम्मत प्रशासनिक अधिकार हो। कोर्ट ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप सभी जिला कलेक्टरों को दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। साथ ही, संबंधित प्राधिकारी को 3 महीने के भीतर जांच कर स्पष्ट करने को कहा है कि उक्त शिव मंदिर निजी है या सार्वजनिक।













