ट्रॉमा केयर अब बना मौलिक अधिकार, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

नई दिल्ली। देश में सड़क हादसों, आग, फैक्ट्री दुर्घटनाओं और अन्य आपात स्थितियों में हर साल लाखों लोगों की मौत हो जाती है। इनमें बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है जिन्हें समय पर इलाज नहीं मिल पाता। इसी गंभीर समस्या को देखते हुए Supreme Court of India ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि ट्रॉमा केयर केवल स्वास्थ्य सेवा नहीं, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है।
समय पर इलाज उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी घायल व्यक्ति को तत्काल चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि इमरजेंसी मेडिकल सहायता केवल सड़क दुर्घटनाओं तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि आग, डूबने, गिरने, विस्फोट, औद्योगिक दुर्घटनाओं और प्राकृतिक आपदाओं में घायल लोगों को भी त्वरित उपचार मिलना चाहिए। कोर्ट ने माना कि देश के कई हिस्सों में आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था अभी भी कमजोर है, जिसके कारण अनेक लोगों की जान इलाज में देरी से चली जाती है।
सभी राज्यों को दिए गए सख्त निर्देश
अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि 100, 101, 102, 108, 1033 और 1091 जैसे सभी आपातकालीन नंबरों को तीन महीने के भीतर एकीकृत कर 112 हेल्पलाइन से जोड़ा जाए। साथ ही सभी सरकारी और निजी एम्बुलेंस में एआईएस-125 मानक, जीपीएस और रियल-टाइम ट्रैकिंग सिस्टम अनिवार्य करने के निर्देश दिए गए हैं। कोर्ट ने गुड समैरिटन कानून के तहत घायलों की मदद करने वाले लोगों की सुरक्षा के लिए शिकायत निवारण तंत्र बनाने और अस्पतालों की ट्रॉमा सुविधाओं की ग्रेडिंग करने का भी आदेश दिया है।
बढ़ते हादसों पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि देश में लगातार बढ़ते हादसे चिंता का विषय हैं। अदालत ने माना कि समय पर चिकित्सा सहायता मिलने पर बड़ी संख्या में मौतों को रोका जा सकता है। इसी कारण एक मजबूत और एकीकृत आपातकालीन चिकित्सा प्रणाली विकसित करना आवश्यक है। कोर्ट ने कहा कि इलाज में अनावश्यक देरी नागरिकों के जीवन के अधिकार का उल्लंघन मानी जा सकती है।
आम लोगों को मिलेगा सीधा लाभ
इस फैसले के बाद एम्बुलेंस सेवाओं और अस्पतालों की जवाबदेही बढ़ेगी। अदालत ने केंद्र की पीएम-राहत कैशलेस उपचार योजना को प्रभावी ढंग से लागू करने के निर्देश भी दिए हैं, जिससे सड़क हादसों के पीड़ितों को शुरुआती इलाज के लिए आर्थिक परेशानियों का सामना कम करना पड़ेगा। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों का प्रभावी क्रियान्वयन हुआ तो देश में हजारों लोगों की जान बचाई जा सकेगी। यह फैसला केवल एक न्यायिक आदेश नहीं, बल्कि देश की आपातकालीन स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत बनाने की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है।













