मोरवा बाजार समेत 2994 एकड़ जमीन और परिसंपत्तियों का मालिक बना एनसीएल
सीबी एक्ट की धारा-11 प्रभावशील, अब केंद्र से एनसीएल में निहित हुई भूमि; नगर निगम के संपत्तिकर पर भी पड़ेगा असर

सिंगरौली। एनसीएल की जयंत और दुधिचुआ कोयला खदानों के विस्तार के लिए अर्जित की गई जमीन को लेकर बड़ा प्रशासनिक और कानूनी बदलाव हुआ है। कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन एवं विकास) अधिनियम, 1957 की धारा-9 के बाद अब 27 अगस्त 2024 से धारा-11 भी प्रभावशील कर दी गई है। इसके साथ ही अधिग्रहीत क्षेत्र की करीब 1211.75 हेक्टेयर यानी 2994.24 एकड़ भूमि और उस पर स्थित परिसंपत्तियां एनसीएल में निहित हो गई हैं। इस दायरे में मोरवा बाजार का बड़ा हिस्सा भी प्रभावित माना जा रहा है।
भारत सरकार के कोयला मंत्रालय की ओर से जारी राजपत्र असाधारण में कहा गया है कि धारा-11 की उपधारा (1) के तहत केंद्र सरकार द्वारा निहित भूमि अब निर्धारित शर्तों के अधीन सरकारी कंपनी नॉर्दर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (एनसीएल) में निहित होगी। संबंधित भूमि का कुल क्षेत्रफल करीब 1211.75 हेक्टेयर है, जिसमें 558 हेक्टेयर और 653.75 हेक्टेयर के दो क्षेत्र शामिल हैं।
प्रतिकर से लेकर कानूनी खर्च तक एनसीएल की जिम्मेदारी
धारा-11 लागू होने के बाद एनसीएल को अधिग्रहित भूमि से संबंधित प्रतिकर, ब्याज, क्षतिपूर्ति और अन्य निर्धारित भुगतानों का वहन करना होगा। इसके अलावा अधिनियम की धारा-14 के तहत गठित होने वाले अधिकरण से संबंधित खर्च तथा भूमि के अधिकारों को लेकर होने वाली अपील और अन्य कानूनी कार्यवाहियों पर आने वाला खर्च भी कंपनी को उठाना होगा।
केंद्र सरकार ने निहित भूमि के संबंध में एनसीएल पर कई शर्तें भी लगाई हैं। कंपनी केंद्र सरकार की पूर्व अनुमति के बिना इस भूमि अथवा इसमें निहित अधिकारों को किसी अन्य व्यक्ति को हस्तांतरित नहीं कर सकेगी। साथ ही केंद्र सरकार की ओर से समय-समय पर जारी निर्देशों और शर्तों का पालन करना होगा।
केंद्र सरकार और अधिकारियों को भी क्षतिपूर्ति देगी कंपनी
प्रावधानों के तहत एनसीएल को केंद्र सरकार अथवा उसके पदाधिकारियों से संबंधित ऐसे खर्चों की भी क्षतिपूर्ति करनी होगी, जो निहित भूमि अथवा उस पर मौजूद अधिकारों से संबंधित कानूनी कार्यवाहियों के कारण उत्पन्न हों। इससे साफ है कि भूमि के अधिग्रहण और हस्तांतरण की पूरी प्रक्रिया में एनसीएल की जिम्मेदारियां व्यापक रहेंगी।
नगर निगम के संपत्तिकर पर भी उठे सवाल
धारा-9 प्रभावशील होने के बाद से ही मोरवा क्षेत्र में नगर निगम की दुकानों के किराए तथा निजी भूमि और उस पर निर्मित मकानों के संपत्तिकर को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अब धारा-11 प्रभावशील होने के बाद यह सवाल और महत्वपूर्ण हो गया है कि निहित भूमि और परिसंपत्तियों पर नगर निगम संपत्तिकर की वसूली किस सीमा तक कर सकेगा।
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा है कि यदि संबंधित भूमि और परिसंपत्तियां अधिनियम के प्रावधानों के तहत एनसीएल में निहित हो गई हैं तो नगर निगम के संपत्तिकर संबंधी अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, इस संबंध में नगर निगम, जिला प्रशासन और एनसीएल को स्थिति स्पष्ट करते हुए सार्वजनिक सूचना जारी करना जरूरी होगा, ताकि प्रभावित नागरिकों को अपनी जमीन, मकान, दुकान और अन्य परिसंपत्तियों पर लागू नियमों की स्पष्ट जानकारी मिल सके।
हजारों लोगों की संपत्तियों पर पड़ेगा सीधा असर
मोरवा क्षेत्र में बड़ी संख्या में नागरिकों की जमीन, मकान और व्यवसायिक प्रतिष्ठान लंबे समय से इस प्रक्रिया के दायरे में हैं। ऐसे में धारा-11 के प्रभावी होने के बाद स्वामित्व, प्रतिकर, संपत्तिकर, किराया और भविष्य में भूमि के उपयोग को लेकर कई सवाल खड़े हो सकते हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन और एनसीएल को इस पूरे मामले में पारदर्शिता के साथ जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए, जिससे लोगों में भ्रम की स्थिति समाप्त हो सके।
धारा-11 के लागू होने के बाद अब 2994.24 एकड़ भूमि का केंद्र सरकार से एनसीएल में निहित होना मोरवा के भविष्य और यहां की निजी व व्यावसायिक परिसंपत्तियों के लिहाज से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।













