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एमपी सरकार को वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी को देने होंगे 78.65 लाख

दिल्ली हाईकोर्ट का आदेश, 9% ब्याज के साथ छह सप्ताह में करना होगा भुगतान; सुप्रीम कोर्ट में पैरवी की फीस से जुड़ा है मामला

नई दिल्ली। मध्य प्रदेश सरकार को सुप्रीम कोर्ट में पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता अनूप जॉर्ज चौधरी की बकाया पेशेवर फीस का भुगतान करना होगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 78 लाख 65 हजार रुपए की राशि 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ अदा करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति सचिन दत्ता ने 31 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए सरकार को भुगतान के लिए छह सप्ताह का समय दिया है।

मामला सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में वरिष्ठ अधिवक्ता की पैरवी और फीस भुगतान से संबंधित है। याचिकाकर्ता की ओर से इंदौर विकास प्राधिकरण और मध्य प्रदेश हाउसिंग बोर्ड से जुड़े मामलों में पैरवी किए जाने का दावा किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में संविधान पीठ के समक्ष विभिन्न तारीखों पर अनूप जॉर्ज चौधरी की उपस्थिति दर्ज थी।

35 बिलों में मांगी गई थी 1.76 करोड़ की फीस

फीस भुगतान को लेकर विवाद उस समय सामने आया, जब वरिष्ठ अधिवक्ता की ओर से बड़ी संख्या में बिल राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत किए गए। कुल 35 बिलों में करीब 1.76 करोड़ रुपए की फीस का दावा किया गया था। राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा था कि अधिवक्ता की औपचारिक नियुक्ति या अधिकृत किए जाने का पर्याप्त आधार उपलब्ध नहीं है।

सरकार ने यह तर्क भी दिया था कि मामला विवादित तथ्यों से जुड़ा है और इसका फैसला रिट याचिका के माध्यम से नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने राज्य की इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही और अन्य उपलब्ध दस्तावेजों को महत्वपूर्ण माना। इनमें राज्य के स्थायी अधिवक्ता की ओर से फीस बिलों को भुगतान के लिए आगे भेजे जाने संबंधी पत्राचार भी शामिल था। अदालत ने तत्कालीन मुख्य सचिव की ओर से अधिवक्ता की नियुक्ति और फीस भुगतान को लेकर की गई स्वीकारोक्ति पर भी गौर किया।

13 पेशियों के आधार पर तय हुई फीस

हाईकोर्ट ने प्रति पेशी 6.05 लाख रुपए, जिसमें लिपिक शुल्क भी शामिल है, की दर स्वीकार की। हालांकि दो संबंधित मामलों की एक साथ सुनवाई के लिए अलग-अलग पेशी शुल्क देने का दावा अदालत ने स्वीकार नहीं किया। सम्मेलन शुल्क के लिए पर्याप्त दस्तावेजी आधार नहीं मिलने पर उस हिस्से को भी मंजूरी नहीं दी गई।

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड से प्रमाणित 13 पेशियों को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने कुल देय राशि 78.65 लाख रुपए निर्धारित की। अदालत ने निर्देश दिया कि याचिका दायर किए जाने की तारीख से वास्तविक भुगतान तक इस राशि पर 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी देना होगा।

दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मध्य प्रदेश सरकार को छह सप्ताह के भीतर भुगतान करने का आदेश दिया है। अब राज्य सरकार को निर्धारित अवधि में 78.65 लाख रुपए और उस पर लागू ब्याज का भुगतान करना होगा।

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