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गर्भवती महिला और आठ वर्षीय बेटे की वापसी पर केंद्र और सुप्रीम कोर्ट सहमत

मानवीय आधार पर हुआ बड़ा निर्णय

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्र सरकार ने बांग्लादेश भेजी गई गर्भवती महिला सुनाली खातून और उसके आठ वर्षीय बेटे को भारत वापस लाने पर सहमति दे दी है। यह निर्णय पूरी तरह मानवीय आधार पर लिया गया है। अचानक गिरफ्तारी और निर्वासन के बाद पीड़िता का परिवार कई महीनों से न्याय के लिए संघर्ष कर रहा था।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने केंद्र से कहा कि गर्भवती महिला और छोटे बच्चे को परिवार से दूर रखना अमानवीय है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह स्थिति बच्चे के भविष्य और महिला की सेहत दोनों के लिए हानिकारक है।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को भरोसा दिया कि महिला और बच्चे को औपचारिक प्रक्रिया के तहत भारत लाया जाएगा। हालांकि इसे ‘मानवीय आधार’ पर लिया गया निर्णय बताया गया है, ताकि यह मिसाल न बने।

मामला तब शुरू हुआ जब पहचान सत्यापन अभियान के दौरान सुनाली और उसके परिवार को दस्तावेज़ों की कमी के आधार पर गैरकानूनी प्रवासी मानकर 26 जून को बांग्लादेश भेज दिया गया। पिता भदू शेख ने दावा किया कि उनकी बेटी भारतीय नागरिक है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने उनकी वापसी का आदेश दिया था, जिसके खिलाफ केंद्र सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

अदालत ने राज्य और केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि सुनाली की चिकित्सीय देखभाल और बच्चे की आवश्यक जरूरतों की पूरी व्यवस्था की जाए। बिरभूम के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को प्रसव तक सभी सुविधाएं निःशुल्क उपलब्ध कराने का आदेश दिया गया है।

अगली सुनवाई 12 दिसंबर को होगी, जहाँ वापसी प्रक्रिया और नागरिकता के मुद्दों पर और स्पष्टता आने की उम्मीद है।

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