विलुप्त होते पक्षी गिद्धों का दिखा बड़ा समूह…

विलुप्त होते पक्षी गिद्धों का दिखा बड़ा समूह…
संजय सिंह मझौली पोल खोल सीधी
सीधी मझौली जनपद पंचायत के ग्राम पंचायत के ठोंगा में गिद्धों का एक बड़ा समूह 6 जनवरी को देखा गया जिसे लोंगों ने अपने कैमरे में कैद किया वैसे विलुप्त होती इस प्रजाति के पक्षियों पर चर्चा होना लाजिमी है ये कत्थई और काले रंग के भारी कद के पक्षी हैं, जिनकी दृष्टि बहुत तेज होती है। शिकारी पक्षियों की तरह इनकी चोंच भी टेढ़ी और मजबूत होती है, लेकिन इनके पंजे और नाखून उनके जैसे तेज और मजबूत नहीं होते। ये झुंडों में रहने वाले मुर्दाखोर पक्षी हैं जिनसे कोई भी गंदी और घिनौनी चीज खाने से नहीं बचती ये हमेशा झुण्ड में पाये जाते हैं गिद्धों की आयु 40 से 45 साल तक होती है. गिद्ध दीर्घायु होते हैं, लेकिन प्रजनन में उन्हें ज़्यादा समय लगता है. यह चार से छह साल की उम्र में प्रजनन योग्य हो जाते हैं इनकी नज़र बहुत तेज़ होती है. ऐसा माना जाता है कि खुले मैदान में वे चार मील दूर से तीन फ़ीट का शव देख सकते हैं गिद्धों की दृष्टि इंसानों से आठ गुना बेहतर होती है गिद्धों को मुर्दाखोर (स्कैवेंजर) कहा जाता है. ये शरीर को ठंडा करने के लिए वे खुद पर पेशाब करते हैं,ये मृत पशुओं व सड़ा हुआ मांस खाने के लिए जाने जाते हैं वैसे नाम से ही ज़ाहिर होता है पाम नट वल्चर (गिद्ध) कई तरह के अखरोट, अंजीर, मछली व कीड़े मकोड़े भी खाते हैं इसी लिए इन्हें प्राकृतिक सफाईकर्मी भी कहा जाता है।

संख्या में हो रही गिरावट
गिद्धों की संख्या में गिरावट का मुख्य कारण डिक्लोफ़िनेक दवा है. यह दवा पशुओं के शवों को खाते समय गिद्धों के शरीर में पहुंच जाती है पशुचिकित्सा में इसका प्रयोग मुख्यतः पशुओं में बुखार,सूजन,उत्तेजन की समस्या से निपटने में किया जाता है हालाँकि डिक्लोफ़िनेक दवा का इस्तेमाल साल 2008 में प्रतिबंधित कर दिया गया है वहीं जगह-जगह पर लगे हाई लेवल के बिजली टॉवर भी इनके इस क्षेत्र से पलायन की बड़ी वजह माने जाते है।













