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ईरान संकट से तेल बाजार में उथल-पुथल, भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुआयामी दबाव

नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजारों में अस्थिरता बढ़ा दी है। इजरायल और संयुक्त राज्य अमेरिका के साथ टकराव की आशंका से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिसका सीधा असर भारत जैसी आयात-निर्भर अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।

होरमुज जलडमरूमध्य पर नजर

होरमुज जलडमरूमध्य से रोजाना लगभग 2 करोड़ बैरल तेल और एलएनजी की आपूर्ति गुजरती है, जो वैश्विक आपूर्ति का करीब 20% है। यहां किसी भी तरह का अवरोध अंतरराष्ट्रीय कीमतों को 90 डॉलर प्रति बैरल या उससे ऊपर ले जा सकता है। भारत अपनी जरूरत का 80% से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में आयात बिल, चालू खाता घाटा और रुपया दबाव में आ सकते हैं।

तेल कंपनियों की मार्जिन पर चोट

Indian Oil Corporation, Bharat Petroleum और Hindustan Petroleum जैसी कंपनियों की ग्रॉस मार्केटिंग मार्जिन कच्चे तेल की हर 1 डॉलर वृद्धि पर लगभग 50 पैसे प्रति लीटर घट सकती है। 80 डॉलर से ऊपर टिकाऊ कीमतें इनके मुनाफे को लगभग समाप्त कर सकती हैं।

विमानन क्षेत्र पर दोहरी मार

एविएशन टर्बाइन फ्यूल कुल परिचालन लागत का 40% तक होता है। दिल्ली में एटीएफ कीमतें 1 लाख रुपये प्रति किलोलीटर के करीब पहुंच चुकी हैं। किराए बढ़ने या मुनाफा घटने की आशंका है।

अपस्ट्रीम कंपनियों को फायदा

ONGC और Oil India Limited जैसी कंपनियों की आय अंतरराष्ट्रीय कीमतों से जुड़ी है। कीमतों में हर डॉलर वृद्धि से उनकी प्रति शेयर आय 1.5–2% तक बढ़ सकती है।

सरकार और आरबीआई की चुनौती

ईंधन महंगा होने पर सरकार को कर घटाने या महंगाई का जोखिम लेने के बीच संतुलन साधना होगा। महंगाई बढ़ने पर भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति भी सख्त हो सकती है।

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