सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: एमपी लोकायुक्त की एसपीई पर भी लागू होगा आरटीआई कानून

नई दिल्ली/भोपाल। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश लोकायुक्त की स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट (एसपीई) को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि यह कोई खुफिया या इंटेलिजेंस एजेंसी नहीं है, इसलिए इसे सूचना का अधिकार (आरटीआई) कानून से छूट नहीं दी जा सकती। अदालत ने मध्य प्रदेश सरकार की उस अधिसूचना को निरस्त कर दिया, जिसके तहत एसपीई को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा गया था।जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस ए.एस. चंदुरकर की पीठ ने सोमवार को सुनाए फैसले में कहा कि लोकायुक्त की एसपीई केवल जांच करने वाली इकाई है, न कि कोई खुफिया संगठन। इसलिए इसे आरटीआई अधिनियम, 2005 के तहत सूचना देने से छूट नहीं मिल सकती।
हाईकोर्ट के फैसले पर लगाई मुहर
सुप्रीम कोर्ट ने 20 दिसंबर 2021 को दिए गए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को भी बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एसपीई द्वारा सूचना देने से इनकार करने को गलत ठहराते हुए आवेदक को जानकारी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। राज्य सरकार ने इसी आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की थी।
2011 की अधिसूचना रद्द
पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा 25 अगस्त 2011 को जारी उस अधिसूचना को भी अवैध करार दिया, जिसमें एसपीई को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर रखा गया था। अदालत ने कहा कि यह अधिसूचना कानून की मंशा और प्रावधानों के अनुरूप नहीं थी, इसलिए इसे निरस्त किया जाना उचित है।
भ्रष्टाचार मामले से जुड़ा था विवाद
मामले की शुरुआत कटनी जिले के तत्कालीन थाना प्रभारी कामता प्रसाद मिश्रा द्वारा दायर आरटीआई आवेदन से हुई थी। वर्ष 2017 में उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला दर्ज हुआ था। जांच के दौरान उन्होंने लोकायुक्त एसपीई से कुछ जानकारियां मांगी थीं, लेकिन एसपीई ने खुद को आरटीआई से मुक्त बताते हुए आवेदन खारिज कर दिया था।
इसके बाद मिश्रा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी सही ठहराया है।
बढ़ेगी पारदर्शिता
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मध्य प्रदेश लोकायुक्त की एसपीई शाखा से भी आरटीआई के माध्यम से जानकारी प्राप्त की जा सकेगी। माना जा रहा है कि इससे जांच एजेंसियों की जवाबदेही और पारदर्शिता को बढ़ावा मिलेगा।













