हाईटेंशन तार ने ली आदिवासी मजदूर की जान, विकास की सड़क पर फिर दो बच्चों के सर से उठा बाप का साया…

हाईटेंशन तार ने ली आदिवासी मजदूर की जान, विकास की सड़क पर फिर दो बच्चों के सर से उठा बाप का साया…
मध्य प्रदेश के सिंगरौली जिले के
ग्राम खैरपुर में प्रधानमंत्री सड़क योजना के अंतर्गत चल रहे सर्वे कार्य के दौरान 22 वर्षीय बालेश्वर बैगा की दर्दनाक मृत्यु ने एक बार फिर विकास की चमकदार भाषा के पीछे छिपी क्रूर सच्चाई को उजागर कर दिया है।

लोहे की सरिया उठाते समय 11,000 केवीए के हाईटेंशन तार के संपर्क में आकर हुई यह मौत किसी दुर्घटना से अधिक, घोर लापरवाही का परिणाम है। जिस कार्य को सरकार पूरी तकनीकी सावधानी, सुरक्षा मानकों और बजट के साथ कराए जाने का दावा करती है, वहां एक युवा मजदूर का यूं असमय काल के गाल में समा जाना व्यवस्था की संवेदनहीनता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।
बालेश्वर बैगा अपने गांव में दिहाड़ी मजदूरी कर पत्नी और दो मासूम बच्चों का पेट पाल रहा था। उसकी मृत्यु के साथ ही केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक पूरा परिवार अंधे भविष्य के हवाले कर दिया गया है। जिन नन्हे हाथों को किताबें और खिलौने थामने चाहिए थे, आज उनके हिस्से में भूख, असुरक्षा और अनिश्चितता आ खड़ी हुई है। यह त्रासदी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस आदिवासी समाज की पीड़ा है जो रोज़गार और सुरक्षा के अभाव में हर दिन जोखिम भरी जिंदगी जीने को मजबूर है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी लापरवाहियों की कीमत हर बार एसटी-एससी वर्ग के लोगों को ही क्यों चुकानी पड़ती है? क्या सरकार की जिम्मेदारी केवल आदिवासी गौरव दिवस मनाकर भाषण देने तक सीमित है, या फिर उनके जीवन की रक्षा और आजीविका की गारंटी भी शासन का कर्तव्य है? जब योजनाओं के लिए बजट है, तकनीक है और दिशा-निर्देश हैं, तो फिर मौत का यह सिलसिला क्यों नहीं थमता—और क्यों हर बार विकास की सड़क पर कुचला जाने वाला चेहरा आदिवासी ही होता है।
।। सिंहावल से राजबहोर केवट की रिपोर्ट ।।













