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अभियोजन में न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, संवैधानिक बहस तेज

नई दिल्ली। आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कानूनी विवाद देश में चर्चा का विषय बन गया है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता-2023 के एक प्रावधान को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, जिसमें सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन विभाग के शीर्ष पदों पर नियुक्त करने की अनुमति दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह प्रावधान संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन करता है और न्यायपालिका की स्वतंत्रता को कमजोर कर सकता है।

यह जनहित याचिका वरिष्ठ आपराधिक वकील पीएस सुबेश ने अधिवक्ता एमएस सुविदत्त के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की है। याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 20 की उपधारा 2(ए) और 2(बी) को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह प्रावधान न्यायपालिका, कार्यपालिका और अभियोजन प्रणाली के बीच संवैधानिक संतुलन को प्रभावित करता है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को कमजोर करता है।

विवादित प्रावधान के अनुसार, कम से कम 15 वर्षों तक अधिवक्ता के रूप में कार्य कर चुके व्यक्ति या सत्र न्यायाधीश रह चुके अधिकारी को अभियोजन निदेशक या उप अभियोजन निदेशक नियुक्त किया जा सकता है। इसी तरह सात वर्षों तक अधिवक्ता रहने वाले या प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य कर चुके व्यक्ति को सहायक अभियोजन निदेशक बनाया जा सकता है। इसके तहत राज्यों में अभियोजन निदेशालय स्थापित करने का भी प्रस्ताव है।

याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान अभियोजन तंत्र को मजबूत करने के उद्देश्य से लाया गया बताया जा रहा है, लेकिन व्यवहार में इससे अभियोजन विभाग कार्यपालिका के नियंत्रण में आ सकता है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यदि न्यायिक अधिकारी अभियोजन विभाग में नेतृत्व की भूमिका निभाते हैं, तो इससे शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित होगा और न्यायिक निष्पक्षता पर भी सवाल खड़े हो सकते हैं।

याचिकाकर्ता ने दलील दी है कि अभियोजन प्रणाली न्यायिक प्रक्रिया का अहम हिस्सा होती है और इसे स्वतंत्र रूप से कार्य करना चाहिए। उनका कहना है कि अभियोजन विभाग यदि कार्यपालिका के प्रशासनिक नियंत्रण में रहेगा और उसमें न्यायिक अधिकारियों को शामिल किया जाएगा, तो इससे आपराधिक न्याय प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि परंपरागत रूप से आपराधिक न्याय प्रणाली तीन स्तंभों पर आधारित होती है—जांच पुलिस करती है, अभियोजन स्वतंत्र लोक अभियोजकों द्वारा किया जाता है और अंतिम निर्णय न्यायपालिका देती है। याचिकाकर्ता का कहना है कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 20 इन तीनों चरणों को कार्यपालिका नियंत्रित ढांचे में लाने का प्रयास करती है, जिससे संवैधानिक सीमाएं प्रभावित हो सकती हैं।

याचिका के अनुसार इस धारा के तहत अभियोजन निदेशालय को पुलिस रिपोर्ट की जांच, आपराधिक जांच की निगरानी, मामलों की सुनवाई तेज करने और अपील दाखिल करने की सलाह देने जैसे व्यापक अधिकार दिए गए हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि ऐसे अधिकारों के साथ न्यायिक अधिकारियों को अभियोजन ढांचे में शामिल करना न्यायिक निष्पक्षता पर असर डाल सकता है।

वर्तमान व्यवस्था का हवाला देते हुए याचिका में कहा गया है कि लोक अभियोजक, अतिरिक्त लोक अभियोजक और सहायक लोक अभियोजक राज्य के गृह विभाग के प्रशासनिक नियंत्रण में कार्य करते हैं। यदि न्यायिक अधिकारियों को इस ढांचे में शामिल किया जाता है तो अभियोजन प्रणाली पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में आ सकती है।

याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से इस प्रावधान को संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह प्रावधान नागरिकों के समानता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को प्रभावित करता है और शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के खिलाफ है।

इस मामले में केंद्र सरकार को भी पक्षकार बनाया गया है। याचिका में गृह मंत्रालय और विधि एवं न्याय मंत्रालय को प्रतिवादी बनाया गया है। संभावना है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में केंद्र सरकार से जवाब तलब करे और आने वाले समय में इसकी संवैधानिक वैधता पर महत्वपूर्ण सुनवाई हो।

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला देश की आपराधिक न्याय प्रणाली की संरचना को प्रभावित करने वाला अहम मामला साबित हो सकता है। अदालत का फैसला अभियोजन व्यवस्था और न्यायिक स्वतंत्रता की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

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