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सतगुरु का भक्त न केवल खुद मुक्ति का हकदार बनता है

सतगुरु का भक्त न केवल खुद मुक्ति का हकदार बनता है

 

मनोज शर्मा,चंडीगढ़। सतगुरु के वचन अनमोल होते हैं, इनका मूल्य संसार की किसी वस्तु से नहीं आंका जा सकता। जो श्रद्धालु सतगुरु के वचनों को केवल सुनता ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में धारण कर उनके अनुसार चलता है, वही वास्तविक मुक्ति का अधिकारी बनता है बल्कि ऐसा व्यक्ति स्वयं का जीवन सफल बनाने के साथ-साथ दूसरों के जीवन को भी सही दिशा प्रदान करता है ये उदगार सूरत से पधारे सन्त निरंकारी मिशन के केन्द्रीय प्रचारक अमृत पाल सिंह ने यहां सन्त निरंकारी सत्संग भवन, सेक्टर-30 में आयोजित सत्संग में हज़ारों की संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं को सम्बोधित करते हुए व्यक्त किए ।

 

 

उन्होंने कहा कि सत्गुरू माता सुदीक्षा जी महाराज द्वारा कराई जा रही परमात्मा की जानकारी के बाद परमात्मा के साथ इकमिक होने की भावना ही आध्यात्मिक जीवन का वास्तविक उद्देश्य है। यह अवस्था सतगुरु की कृपा, सत्संग, सेवा, सिमरन तथा गुरमत के मार्ग पर निरन्तर चलते रहने से प्राप्त होती है। गुरबाणी का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि जिस पर गुरु की कृपा होती है, वही इस आध्यात्मिक मार्ग की सही पहचान कर पाता है और धीरे-धीरे निराकार प्रभु में लीन होने का अनुभव करता है।

 

अमृत पाल सिंह ने कहा कि आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मचिंतन अत्यन्त आवश्यक है। सत्संग में आने का उद्देश्य केवल उपस्थिति दर्ज कराना नहीं, बल्कि अपने जीवन का मूल्यांकन करना है कि हम आध्यात्मिक मार्ग पर कितनी प्रगति कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पूर्वज संतों और महापुरुषों का जीवन हमारे लिए मील के पत्थरों के समान है, जिन्हें देखकर हमें अपनी आध्यात्मिक यात्रा का आकलन करने की प्रेरणा मिलती है। यदि हम निरन्तर आगे बढ़ रहे हैं तो यह सौभाग्य की बात है, लेकिन यदि हम कहीं ठहर जाएँ या पीछे हटने लगें तो यह आत्ममंथन का विषय है।

 

उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि ज्ञान, सतगुरु और परमात्मा सभी के लिए समान हैं, किन्तु उन्हें ग्रहण करने की पात्रता प्रत्येक व्यक्ति की श्रद्धा, विश्वास और समर्पण पर निर्भर करती है। इसी कारण एक ही सत्संग में कुछ श्रद्धालु ईश्वरीय आनंद से सराबोर दिखाई देते हैं, जबकि कुछ के मन में अभी भी शंकाएँ और दुविधाएँ बनी रहती हैं। उन्होंने कहा कि जब श्रद्धालु सतगुरु के निकट आता है, उनके वचनों पर पूर्ण विश्वास करता है और उन्हें जीवन में उतारता है, तभी वह निराकार की वास्तविक महिमा और रहस्य को समझ पाता है।

 

उन्होंने पूज्य बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के विचारों का उल्लेख करते हुए समझाया कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति पानी में जितना अधिक उतरता है, उसे उतनी ही अधिक शीतलता का अनुभव होता है, उसी प्रकार जो श्रद्धालु जितनी अधिक मात्रा में अपने हृदय में निराकार का वास करता है, वह उतना ही अधिक आध्यात्मिक आनंद प्राप्त करता है। पूर्ण समर्पण की अवस्था में पहुँचने वाले विरले संत ही परमात्मा के साथ इकमिक होने का अनुभव करते हैं और उनका जीवन दूसरों के लिए प्रेरणा बन जाता है।

 

सत्संग के अंत में उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे प्रेम, नम्रता, सेवा, सिमरन और सतगुरु के उपदेशों को अपने दैनिक जीवन का आधार बनाएं। यही मार्ग मानव जीवन को सार्थक बनाता है तथा समाज में भाईचारे, सद्भाव और आध्यात्मिक मूल्यों को सुदृढ़ करता है।

 

इससे पूर्व यहां के संयोजक नवनीत पाठक ने अमृतपाल का सूरत से पधारने पर सारी साधसंगत की ओर से धन्यवाद व स्वागत किया ।

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