युवा धर्म संसद में बोले मोहन भागवत- अहंकार में व्यक्ति समझता है सब कुछ उसके नियंत्रण में, लेकिन ऐसा नहीं
उज्जैन में जेन-जी युवाओं से संवाद, कहा- धर्म बुढ़ापे के लिए नहीं, जीवन की शुरुआत से अंत तक साथ रहता है

युवा धर्म संसद में बोले मोहन भागवत- अहंकार में व्यक्ति समझता है सब कुछ उसके नियंत्रण मे
उज्जैन। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने उज्जैन में आयोजित छठी युवा धर्म संसद में जेन-जी युवाओं को संबोधित करते हुए सनातन संस्कृति, धर्म, कर्तव्य, राष्ट्रीय जिम्मेदारी और सामाजिक समरसता पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि युवा धर्म के बारे में सोच रहे हैं, यह अपने आप में प्रसन्नता की बात है। धर्म को केवल बुढ़ापे से जोड़ना सही नहीं है। गीता और रामायण को सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने वाली किताबें मानने की धारणा ठीक नहीं है।
भागवत ने कहा कि धर्म सृष्टि की शुरुआत से लेकर उसके अंत तक विद्यमान रहता है। व्यक्ति इसमें विश्वास करे या न करे, प्रकृति अपने नियमों के अनुसार चलती रहती है। उन्होंने सूर्य के उगने और डूबने का उदाहरण देते हुए कहा कि किसी के विश्वास करने या न करने से प्रकृति के नियम नहीं बदलते।
उन्होंने कहा कि अहंकार में व्यक्ति यह मानने लगता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और हर चीज उसकी इच्छा के अनुसार होनी चाहिए। यही उसकी गलतफहमी है। वास्तविकता यह है कि जीवन में सभी परिस्थितियां व्यक्ति की इच्छा के अनुसार नहीं चलतीं।
युवाओं से संवाद करते हुए भागवत ने कहा कि धर्म को समझने के लिए पहले से मन में बैठे विचारों से स्वयं को मुक्त कर चिंतन करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि धर्म कोई ऐसा नियम नहीं है, जिसे केवल प्रयोगशाला में देखा जाए। धर्म व्यक्ति के आचरण और कर्तव्य में दिखाई देता है।
उन्होंने धर्म का अर्थ समझाते हुए कहा कि बेटे का अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्य, राजा का प्रजा के प्रति कर्तव्य और प्रत्येक जीव का उसके स्वभाव के अनुरूप आचरण धर्म से जुड़ा है। उन्होंने पानी के बहने और आग के जलने को उसके स्वभाव का उदाहरण बताया।
भागवत ने महाभारत और भगवद्गीता का उल्लेख करते हुए कहा कि महाभारत के माध्यम से धर्म को समझने का प्रयास किया गया है। उन्होंने कहा कि युधिष्ठिर ने अपना पूरा जीवन धर्म को समझने में लगा दिया। परिस्थितियां कितनी भी कठिन रही हों, उन्होंने धर्म का साथ नहीं छोड़ा।
उन्होंने युवाओं से कहा कि वे उनके विचारों को आंख बंद करके स्वीकार करने के बजाय उन पर चिंतन और चर्चा करें। उनके अनुसार, धर्म का उद्देश्य समाज और दुनिया के कल्याण के लिए लोगों को जोड़ना तथा उनके कर्तव्यों का निर्धारण करना है।













