मां-पापा… आपने दुनिया दिखा दी..मानवता शर्मसार : तेदुआ पहाड़ गांव के पास झाड़ियों में मिली नवजात बच्ची…

मां-पापा… आपने दुनिया दिखा दी..मानवता शर्मसार : तेदुआ पहाड़ गांव के पास झाड़ियों में मिली नवजात बच्ची…
पोल खोल पोस्ट जिला ब्यूरो सीधी:-
अमिलिया थाना अंतर्गत ग्राम पंचायत तेंदुआ (बिठौली) पहाड़ से सटे गांव से मानवता को ही शर्मसार करने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां बिठौली पहाड़ से सटे एक टोला के पास कटीली झाड़ियों में नवजात बच्ची मिली है।अनुमान लगाया जा रहा है कि इसका जन्म 1-2 घंटे के भीतर हुआ है।अब तक बच्ची की पहचान नहीं हो सकी है। बच्ची काले रंग के स्टाल के कपड़े में लपेटकर कटीली झाड़ियों के बीच रखी गई थी। मां-पिता ने ये भी नहीं सोचा कि चीटियां और कीड़े-मकोड़े नवजात बच्ची को नोच सकते हैं।हरी कटीली झाड़ियों के बीच साफ काले रंग के कपड़े ने राहगीरों के ध्यान को खींच लिया।लोगों ने तत्काल पुलिस को इसकी सूचना दी।लेकिन तीन घंटे बीत जाने के बाद भी अमिलिया पुलिस नवजात बच्ची के मिलने वाले स्थल पर पहुंचने की कोशिश नहीं समझी,ग्रामीणों ने अमिलिया पुलिस पर लापरवाही व गैरजिम्मेदाराना रवैये का आरोप लगाते हुए नाराजगी जाहिर की है।बसपा नेत्री रानी वर्मा सहित ग्रामीणों ने अमिलिया पुलिस को सूचना देते हुए नवजात बच्ची को सही सलामत बिठौली अस्पताल पहुंचा दिया है।फिलहाल नवजात बच्ची स्वस्थ बताई जा रही हैं।
नहीं होती तफ्तीश
झाड़ियों के बीच मिली नवजात बच्ची को लेकर गांव में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। लोगों का कहना है कि कलयुगी मां-बाप निर्दयतापूर्वक नवजात बच्ची को कटीली झाडियों के बीच फेककर अपने कुकर्म को छिपाया है।ऐसे में मामले को संदिग्ध माना जा रहा है।और क्षेत्र मे सनसनी फैल गई है।
रानीवर्मा बर्मा का आरोप सूचना देंने पर तीन घंटे तक नहीं पहुंची पुलिस:-
एक सोशल मीडिया पर आरोप लगाते हुए सपा नेत्री रानी वर्मा ने अमिलिया थाना प्रभारी राकेश बैस पर आरोप लगाते हुए बताई है कि हमारे द्वारा जब दूरभाष पर अमिलिया थाना प्रभारी को नवजात बच्ची के मिलने के संबंध में लगभग 3 बजे जानकारी दी गई लेकिन थाना प्रभारी अमिलिया का गैरजिम्मेदाराना तरीकें से बात करना जिम्मेदार पद पर बैठना शोभा नहीं देता है। हद तो तब हो गई जब थाना प्रभारी बसपा नेत्री से ये बोल दिए कि मैडम ये मेरा काम नहीं है, ये डॉक्टर का काम है। शाम 6 बजे बसपा नेत्री के मोबाइल पर थाना प्रभारी का फोन आया तब वे बोल रहे हैं कि मैडम कौन देखा है उसे भेज दीजिए एफआईआर कर देते है। इस बात से अनुमान लगाया जा सकता है कि थाना प्रभारी अमिलिया राकेश बैस कितनी जबावदेही से काम करते होगे। 4 घंटे बीत जाने के बावजूद अमिलिया पुलिस मौके पर नहीं पहुंची।
नन्ही जान के साथ अन्याय
जिले के अमिलिया थाना क्षेत्र की घटना ने मानवता को ऐसी गहरी चोट पहुंचाई है, जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई देगी। झाड़ियों के बीच लावारिस हालत में पड़ी मासूम बच्ची उस समाज की कड़वी सच्चाई को उजागर करती है,जो प्रगति का दम तो भरता है,परंतु अपनी जड़ों से कटता जा रहा है। सर्द रातों में नन्ही जान को बेसहारा छोड़ने वाले ने क्या यह नहीं सोचा होगा कि ऐसी परिस्थितियों में बच्ची कैसे जीवित रह पाएगी? यह सोचकर भी आत्मा सिहर उठती है कि आखिर वह कौन-सी विवशता रही होगी जिसने एक मां को अपनी कोख से जन्मी कली को इस क्रूरता के साथ छोड़ने पर मजबूर कर दिया।दोपहर की सैर पर निकले कुछ संवेदनशील ग्रामीणो ने उस बच्ची को देखा और तुरंत अस्पताल पहुंचाया।सवाल यह है कि समाज के प्रति यह किस तरह की अमानवीयता का प्रतीक है? क्या उस मां की मजबूरी इतनी बड़ी थी कि उसने अपनी मासूम को प्रकृति के क्रूर हाथों में सौंप दिया? या यह समाज की विफलता है, जिसने उसे ऐसा करने पर मजबूर किया? हर नवजात ईश्वर का वरदान होता है। फिर क्यों समाज उसे बोझ समझता है? क्यों हमें आज भी ऐसी अमानवीय घटनाओं का सामना करना पड़ता है? यह घटना केवल एक बच्ची का त्याग नहीं है, बल्कि यह हमारी सामाजिक, नैतिक और संवेदनात्मक विफलताओं का दर्पण है। अगर हमारा समाज थोड़ा संवेदनशील होता, तो क्या उस मां को सहायता नहीं मिल सकती थी? क्या हम एक ऐसा वातावरण नहीं बना सकते थे, जहां कोई मां इस तरह का कठोर निर्णय लेने के लिए मजबूर न हो? यह घटना हमारी सामाजिक व्यवस्था पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े करती है। क्या हमारा समाज इतना संवेदनहीन हो गया है कि बच्चियों के लिए कोई जगह नहीं बची? क्या हमारा नैतिक कर्तव्य सीमित रह गए हैं?
मासूम बच्ची की मर्मस्पर्शी कहानी हर दिल को झकझोरती है। क्या वह बच्ची सुरक्षित रहेगी? क्या उसे समाज अपनाएगा? क्या वह एक सामान्य जीवन जी सकेगी? यह हर उस व्यक्ति के लिए एक चुनौती है, जो अपने आप को मानवता का समर्थक मानता है। यह घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि समाज के नाम एक संदेश है। हर बच्ची को जीने का अधिकार है। हर बच्ची की किलकारियां किसी घर की खुशी बन सकती हैं। इस घटना को एक सबक के रूप में लेते हुए हमें ऐसे तंत्र विकसित करने होंगे, जो हर मां को मजबूरी में भी साहस दे और हर बच्ची को एक सुरक्षित भविष्य। समाज को जागना होगा। संवेदनाएं मरने से पहले पुनर्जीवित करनी होंगी। इंसानियत को बचाना होगा।













