स्वामी सच्चिदानंद सरस्वती ने ईश्वर के वैदिक स्वरूप पर डाला प्रकाश

मनोज शर्मा,चंडीगढ़ । महर्षि दयानन्द सरस्वती जी के 202वें जन्मोत्सव के उपलक्ष्य में आर्य समाज की केन्द्रीय आर्य सभा के तत्वावधान में आर्य समाज सेक्टर 9 पंचकूला में आयोजित चार दिवसीय भव्य कार्यक्रमों के दूसरे दिन स्वामी सच्चिदानंद जी ने सैद्धांतिक पक्ष पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया।
स्वामी सच्चिदानंद जी ने कहा कि ईश्वर को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियां फैली हुई हैं। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने आर्य समाज के दूसरे नियम के माध्यम से इन भ्रांतियों का निवारण करते हुए ईश्वर के स्वरूप का स्पष्ट वैदिक मत प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि संसार की सभी विधाओं—जैसे गणित, रसायन, भौतिक विज्ञान और शरीर विज्ञान—में वैज्ञानिक तर्क-वितर्क के माध्यम से एकमत सिद्धांत स्थापित किए जाते हैं, जिन्हें संपूर्ण विश्व मान्यता देता है। इसी प्रकार यदि धर्माचार्य और विद्वान भी तर्क-वितर्क के माध्यम से विचार करें तो ईश्वर के विषय में भी स्पष्ट सिद्धांत स्थापित हो सकते हैं।
उन्होंने कहा कि आज धर्म के नाम पर अनेक भ्रांतियां फैलाई जा रही हैं और नए-नए भगवानों की अवधारणाएं प्रस्तुत कर भोले-भाले लोगों को गुमराह किया जा रहा है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने मानव बुद्धि के बंधनों को खोलते हुए सत्य और तर्क पर आधारित सिद्धांत दिए, जिससे मनुष्य पाखंड से ऊपर उठ सकता है। उन्होंने ईश्वर को सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, निराकार और सर्वव्यापक बताया, जो कण-कण में विद्यमान है। आर्य समाज का दूसरा नियम- ईश्वर सच्चिदानन्द स्वरूप,निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी,दयालु,अजन्मा,अनंत,निर्विकार,अनादि,अनुपम,सर्वाधार,सर्वेश्वर, सर्वव्यापक,सर्वान्तर्यामी,अजर,अमर,अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है; उसी की उपासना करनी चाहिए।कार्यक्रम के दौरान भूपेंद्र आर्य ने मधुर भजनों की प्रस्तुति देकर वातावरण को भक्तिमय बना दिया, जिसे उपस्थित श्रद्धालुओं ने अत्यंत सराहा।













